Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

पुरुषोत्तम मास - आपके जीवन का एक दुर्लभ अवसर 17 मई से 15 जून 2026

पुरुषोत्तम मास - आपके जीवन का एक दुर्लभ अवसर 17 मई से 15 जून 2026


लेखक: रवि शेखर सिन्हा उर्फ आचार्य मनमोहन।
ज्योतिष मार्तंड एवं जन्म कुण्डली विशेषज्ञ।
हर हर महादेव!!
पुरुषोत्तम मास में ३३ मालपुवे का दान सबसे बड़ा दान माना गया है। इसकी विधि और महिमा स्वयं भगवान शिवजी ने माता पार्वतीजी को बताया है।
वैसे तो नियम यह है की मलमास के पूरे एक महीने तक अर्थात 30 दिनों तक प्रतिदिन 33 मालपुआ का दान किया जाता है। किंतु यदि संभव न हो तो मलमास में किसी भी एक दिन विशेष तिथि पर एकादशी, पूर्णिमा अथवा सर्वार्थ सिद्धि अमृत योग इत्यादि तिथियों में यदि 33 मालपुआ का दान कर दिया जाए तो विशेष लाभदायक होता है। इस वर्ष 2026 में पुरुषोत्तम मास में 21 मई गुरुवार के दिन अद्भुत संयोग बना रहा है, गुरु पुष्य अमृत योग का।

गुरु पुष्य में किया गया दान अनंत गुना फलदायक होता है। अतः 21 मई गुरुवार के दिन 33 मालपुआ बना लें।उसे कांसे के किसी पात्र में रखकर एक साथ सभी मालपुआ को धागे से सात बार लपेटकर बांध दें। यह सात बार धागा लपेटना सप्ताह के सातों दिनों का प्रतीक होता है।
33 मालपुआ 33 कोटी अर्थात 33 प्रकार के देवी देवताओं के निमित्त यह भोग प्रसाद होता है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार 33 मालपुआ दान करने का अभिप्राय यह है कि महीने के 30 दिन के हिसाब से एक-एक मालपुआ, 30 मालपुआ।
31वां मालपुआ इसलिए दान किया जाता है कि यदि किसी ने कन्यादान के बाद यदि कन्या के घर पर भोजन कर लिया हो तो उसके दोष की शांति के लिए 31वां मालपुआ होता है।
यदि किसी व्यक्ति ने किसी तेजस्वी, तपस्वी, ब्राह्मण अथवा अपने गुरु के घर पर कुछ खा लिया हो, भोजन कर लिया हो तो उस दोष की शांति के लिए 32वां मालपुआ दान किया जाता है।
ठीक इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति ने किसी के यहां सूतक पातक में भोजन कर लिया हो अर्थात किसी के यहां किसी की मृत्यु के बाद मृतक भोज कर लिया हो अथवा किसी के यहां संतान के उत्पन्न होने के बाद सूतक में भोजन कर लिया हो तो उसकी दोष की शांति के लिए 33वां मालपुआ दान किया जाता है। इस प्रकार 33 मालपुआ दान करने का विधान है।

अधिक मास की कथा में मालपुआ के अलावा दूसरी किसी मिठाई के बारे में चर्चा नहीं है। कारण यह है कि मालपुआ बनाते समय मालपुआ मालपुआ के अंदर जितने छेद हो जाते हैं, उतने नरकों में जाने से हमारे पूर्वजों को मुक्ति मिल जाती है और उन्हें देवलोक में स्थान प्राप्त होता है। अधिक मास में 33 मालपुआ दान करने पर व्यक्ति को किसी भी अवस्था में मृत्यु होने पर नरक में नहीं जाना पड़ता। ऐसे व्यक्ति को देवलोक में स्थान प्राप्त होता है।

शास्त्रों के अनुसार इन 33 देवताओं को चार मुख्य भागों में बाँटा गया है: 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य और 2 अन्य देवता।

33 मालपुआ को एक के ऊपर एक रखकर एक साथ धागे से सात बार लपेटकर कांसे के किसी एक पात्र में रखकर श्री हरि भगवान विष्णु के समक्ष रख दें ।उनसे समस्त प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करने की प्रार्थना करते हुए निम्नलिखित इन मंत्रों का पाठ करें।

A. अष्ट वसु (8 देवता).

1. धर – ॐ धराय नमः।
2. आप – ॐ अद्भ्यो नमः। (या ॐ आपाय नमः।)
3. अनल – ॐ अनलाय नमः।
4. अनिल – ॐ अनिलाय नमः।
5. ध्रुव – ॐ ध्रुवाय नमः।
6. सोम – ॐ सोमाय नमः।
7. प्रत्यूष – ॐ प्रत्यूषाय नमः।
8. प्रभास – ॐ प्रभासाय नमः।

B. एकादश रुद्र (11 देवता):

1. कपाली – ॐ कपालिने नमः।
2. पिंगल – ॐ पिंगलाय नमः।
3. भीम – ॐ भीमाय नमः।
4. विरूपाक्ष – ॐ विरूपाक्षाय नमः।
5. विलोहित – ॐ विलोहिताय नमः।
6. शास्ता – ॐ शास्त्रे नमः।
7. अजपाद – ॐ अजपादाय नमः।
8. अहिर्बुध्न्य – ॐ अहिर्बुध्न्याय नमः।
9. शम्भु – ॐ शम्भवे नमः।
10. चण्ड – ॐ चण्डाय नमः।
11. भव – ॐ भवाय नमः।

C. द्वादश आदित्य (12 देवता):

1. धाता – ॐ धात्रे नमः।
2. मित्र – ॐ मित्राय नमः।
3. अर्यमा – ॐ अर्यम्णे नमः।
4. शक्र – ॐ शक्राय नमः।
5. वरुण – ॐ वरुणाय नमः।
6. अंश – ॐ अंशाय नमः।
7. भग – ॐ भगाय नमः।
8. विवस्वान – ॐ विवस्वते नमः।
9. पूषा – ॐ पूष्णे नमः।
10. सविता – ॐ सवित्रे नमः।
11. त्वष्टा – ॐ त्वष्ट्रे नमः।
12. विष्णु – ॐ विष्णवे नमः।

D. अन्य देवता (2 देवता)
(शतपथ ब्राह्मण और बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार)

1. इन्द्र – ॐ इन्द्राय नमः।
2. प्रजापति – ॐ प्रजापतये नमः।
*यदि अश्विनी कुमारों को इस स्थान पर गिना जाए, तो उनके मंत्र इस प्रकार होंगे:
• नासत्य – ॐ नासत्याय नमः।
• दस्र – ॐ दस्राय नमः।

मंत्र और श्लोक:


*विष्णुरूपी सहस्त्रांशु सर्वपापप्रणाशनः ।। अपूपान्नप्रदानेन मम पापं व्यपोहतु।*
( सब पापों को नष्ट करनेवाले विष्णुरूपी सूर्य अपूपान्त्र के देनेमात्र से मेरे पापों को दूर करें।)


*नारायण जगद्बीज भास्करप्रतिरूपक ।। व्रतेनानेन पुत्रांश्च संपदं चाभिवर्द्धय।*
(नारायण भास्करप्रतिरूपक जगद्द्वीज इस व्रत से मेरे पुत्रों की तथा संपत्ति की अभिवृद्धि करो।)


*यस्य हस्ते गदाचक्रे गरुडो यस्य वाहनम् ।।शङ्खः करतले यस्य स मे विष्णुः प्रसीदतु।*
(जिसके हाथ में गदा, चक्र है, गरुड़ जिसका वाहन है, शंख जिसके हाथ में है वह विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों।)


*कलाकाष्ठादिरूपेण निमेषघटिकादिना ।। यो वञ्चयति भूतानि, तस्मै कालात्मने नमः।*
(कला और काष्ठादिरूप से निमेष घटी आदिरूप से जो सब प्राणियों की वञ्चना करता है, उस कालरूप को नमस्कार है।)


*कुरुक्षेत्रमयं देशः कालः पर्व द्विजो हरिः ।। पृथ्वीसममिदं दानं गृहाण पुरुषोत्तम।*
(यह देश कुरुक्षेत्र के तुल्य है। काल पर्व के तुल्य है। यह द्विज हरि के तुल्य है। हे पुरुषोत्तम! पृथ्वी के तुल्य इस दान को ग्रहण करो।)


*मलानां च विशुद्ध्यर्थं पापप्रशमनाय च ।। पुत्रपौत्राभिवृद्ध्यर्थं तव दास्यामि भास्कर।*
(हे भास्कर, मलों की शुद्धि तथा पापों के प्रशमन के लिए पुत्र-पौत्र आदि वृद्धि के लिये आपको देता हूँ।)

इति शुभमस्तु!!
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ