“मानवता की रक्षा के लिए था परशुराम का शास्त्र और शस्त्र” :- डॉ. विवेकानंद मिश्र, गया में गरिमामयी जयंती समारोह

गया (बिहार):
गया जी के स्थानीय डॉक्टर विवेकानंद पथ पर भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच के संयुक्त तत्वावधान में भगवान महर्षि परशुराम की जयंती अत्यंत श्रद्धा और गरिमा के साथ मनाई गई। कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच दीप प्रज्वलन से हुआ, जिसे डॉ. विवेकानंद मिश्र और आचार्य सच्चिदानंद मिश्र ने संयुक्त रूप से संपन्न किया।
समारोह में वक्ताओं ने महर्षि परशुराम के व्यक्तित्व के उन पहलुओं को सामने रखा, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। उन्होंने समाज में फैली इस भ्रांति का खंडन किया कि परशुराम केवल क्रोध और संहार के प्रतीक थे।
🗣️ धर्म और न्याय के लिए उठाया शस्त्र

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. विवेकानंद मिश्र ने कहा कि महर्षि परशुराम शास्त्र और शस्त्र दोनों के अद्वितीय ज्ञाता थे। उनका क्रोध किसी जाति विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि अधर्म और अत्याचार के खिलाफ था।
उन्होंने स्पष्ट किया कि परशुराम ने शस्त्र केवल इसलिए उठाए ताकि निर्दोष मानवों, गौशालाओं और वैदिक परंपराओं की रक्षा की जा सके।
🧘 आध्यात्मिकता और राष्ट्रनीति का अद्भुत संगम
आचार्य सच्चिदानंद मिश्र ने अपने विचार रखते हुए कहा कि महर्षि परशुराम केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के दार्शनिक और राष्ट्रनीतिक विचारक भी थे।
उन्होंने बताया कि परशुराम ने समाज में वर्ग-भेद से ऊपर उठकर न्याय को सर्वोच्च स्थान दिया और उनके जीवन में कोमलता एवं कठोरता का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है।
🏛️ ऐतिहासिक भ्रांतियों को तोड़ने की जरूरत
भारतीय जन क्रांति दल के संस्थापक अध्यक्ष आर.डी. मिश्र ने कहा कि परशुराम को केवल “क्षत्रियों के विनाशक” के रूप में प्रस्तुत करना एक ऐतिहासिक भूल है।
उन्होंने कहा कि जब सत्ता अहंकार में निर्दोषों पर अत्याचार करने लगे, तब उसका विरोध करना ही सच्चा मानवीय धर्म है।
🛡️ ब्राह्मण का धर्म: केवल पूजा नहीं, सुरक्षा भी
कार्यक्रम में पूर्व पुलिस महानिदेशक सुरेश भारद्वाज ने अपने विचार रखते हुए कहा कि परशुराम का जीवन यह संदेश देता है कि ब्राह्मण का कर्तव्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज और राष्ट्र की रक्षा के लिए पराक्रम दिखाना भी आवश्यक है।
⚖️ अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा
अंत में भाजपा के वरिष्ठ नेता हरि नारायण त्रिपाठी ने कहा कि परशुराम जयंती हमें यह सिखाती है कि जब-जब समाज में अन्याय बढ़ता है, तब ईश्वरीय शक्ति किसी न किसी रूप में अवतरित होकर संतुलन स्थापित करती है।
डॉ. ज्ञानेश भारद्वाज सहित अन्य वक्ताओं ने कहा कि परशुराम का फरसा केवल एक शस्त्र नहीं, बल्कि न्याय और धर्म का प्रतीक है।
👥 उपस्थिति
इस अवसर पर समाज के विभिन्न वर्गों के सैकड़ों लोग उपस्थित रहे। प्रमुख रूप से डॉ. दिनेश कुमार सिंह, डॉ. रविंद्र कुमार, मो. उमैर, मोहम्मद याहिया, राजेश त्रिपाठी, सत्येंद्र दुबे, मृदुला मिश्रा, अरुण ओझा, प्रो. अशोक कुमार सहित कई गणमान्य लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
✍️ समापन संदेश
गया में आयोजित यह भव्य समारोह यह संदेश देने में सफल रहा कि महर्षि परशुराम के आदर्श—त्याग, न्याय, साहस और धर्म—आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने प्राचीन काल में थे। एक न्यायपूर्ण और संतुलित समाज के निर्माण के लिए उनके विचार आज भी प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।
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