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देखते हैं यह इतिहास कब बनता है....

देखते हैं यह इतिहास कब बनता है....

डॉ राकेश कुमार आर्य
आर्यत्व निरंतर बढ़ते रहने की साधना का नाम है । इसलिए ' आर्य ' सृष्टि का अत्यंत सुंदर शब्द है। इसका वास्तविक स्वरूप हमें ' ओ३म ' की पवित्रता के साथ तादात्म्य स्थापित करने की प्रेरणा देता है। आर्यत्व का हमारी बुद्धि से सीधा संबंध है। हम बुद्धिबल के अर्थात ज्ञानबल के उपासक रहे हैं। हमने ज्ञान की अर्थात तेज की साधना की है। प्रकाश की साधना की है। इसलिए हमने संसार में अनेक प्रकार के आविष्कार किये। हमने ऊर्जा की साधना की । इसलिए हमने सूर्यवंश की भी स्थापना की। अपने ज्ञानबल से ही हमने संसार का नेतृत्व किया है। हमने किसी को मारकर या किसी भी प्रकार से दूसरों पर अत्याचार करके अपने साम्राज्य स्थापित नहीं किये अपितु जो लोग अपने यहां पर जनसाधारण पर अत्याचार कर रहे थे, हमने उनको उखाड़ने का प्रशंसनीय कार्य किया है। हमने अपने बुद्धि बल से दूसरों को परास्त किया है।
चाणक्य नीति में आया है कि :-


बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्
वने सिम्हो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः।


अर्थात " जिसके पास बुद्धि है, उसके पास बल है । जिसके पास बुद्धि नहीं उसके पास बल कहाँ ? देखो, बलवान शेर को चतुर लोमड़ी ने कैसे मार डाला था ।"
महर्षि दयानंद जी महाराज ने " वेदों की ओर लौटो " का नारा देकर आर्यत्व को इसी प्रकार का राष्ट्रबोध, धर्मबोध और संस्कृति बोध कराने का सफल प्रयास किया था। जिसके फलस्वरुप भारत के आर्यजन जाग उठे । उन्हें लगा कि भारत पर यदि इस समय अंग्रेज शासन कर रहे हैं तो यह उनका अत्याचार है और उनके अत्याचार का प्रतिकार करना भारत के लोगों का सबसे पवित्र कर्तव्य - धर्म है। महर्षि दयानंद जी की प्रेरणा से भारत के लोगों ने अपने वास्तविक स्वरूप को समझकर भारत को स्वाधीन करने का महान संकल्प धारण किया। अंतिम परिणाम यह हुआ कि 15 अगस्त 1947 को देश स्वाधीन हुआ। यद्यपि पाकिस्तान के रूप में एक बहुत बड़ी कीमत भी भारत को चुकानी पड़ी। यदि महर्षि दयानंद जी महाराज के अनुसार काम किया जाता तो यह कीमत भी चुकानी नहीं पड़ती । क्योंकि तब आर्यों का क्रांतिकारी आंदोलन सब पर भारी होता, जो मां भारती के टुकड़े न होने देता और विदेशियों को खदेड़-खदेड़कर कर यहां से भगाता।
“स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश”में अपने मन्तव्यों के आरम्भ में महर्षि दयानंद जी ने लिखा है कि “सर्वतन्त्र सिद्धान्त अर्थात् सार्वजनिक धर्म, जिसको सदा से (सृष्टि के आरम्भ से) सब लोग मानते आये, मानते हैं और मानेंगे भी, इसीलिये उसको सनातन नित्य धर्म कहते हैं कि जिसका विरोधी कोई भी न हो सके। यदि अविद्यायुक्तजन अथवा किसी मत (पन्थ व सम्प्रदाय) वाले के भ्रमाये हुए जन जिसको अन्यथा जानें वा मानें, उसका स्वीकार कोई भी बुद्धिमान नहीं करते किन्तु जिसको आप्त अर्थात् सत्यमानी, सत्यवादी, सत्यकारी, परोपकारी, पक्षपातरहित विद्वान मानते हैं वही सबको मन्त्व्य और जिसको नहीं मानते, वह अमन्तव्य होने से प्रमाण के योग्य नहीं होता। अब जो वेदादि सत्यशास्त्र और ब्रह्मा ऋषि से लेकर जैमिनी मुनि पर्यन्तों के माने हुए ईश्वरादि पदार्थ हैं, जिनको कि मैं भी मानता हूं, (उन स्वमन्तव्यामन्तव्यों को) सब सज्जन महाशयों के सामने (स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश लघु पुस्तिका के माध्यम से) प्रकाशित करता हूं। मैं अपना मन्तव्य उसी को जानता हूं कि जो तीन काल में सबको एक सा मानने योग्य हैं। मेरा कोई नवीन कल्पना वा मतमतान्तर चलाने को लेशमात्र भी अभिप्राय नहीं है, किन्तु जो सत्य है, उसको मानना, मनवाना, और जो असत्य है, उसको छोड़ना और छुड़वाना मुझको अभीष्ट है। यदि मैं पक्षपात करता तो आर्यावर्त में प्रचलित मतों में से किसी एक मत का आग्रही होता किन्तु जो-जो धर्मयुक्त बातें हैं उनका त्याग नहीं करता, न करना चाहता हूं, क्योंकि ऐसा करना मनुष्यधर्म से बहिः (अर्थात् विरूद्ध) है।”
यह स्वामी दयानंद ही हो सकते थे जिन्होंने व्यक्ति पूजा का अवलंब न लेकर अपने आप को कोई पीर, पैगंबर या मत प्रवर्तक आदि बनाने से स्पष्ट इनकार कर दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि संसार को किसी नए मत, पंथ की आवश्यकता नहीं है अपितु सर्वाधिक प्राचीन सनातन वेद धर्म को ही जानने की आवश्यकता है। उसके जानते ही जितने मत, पंथ या संप्रदाय संसार में प्रचलित हैं - वे सब अपने आप ही मिट जाएंगे। स्वामी दयानंद जी के समकालीन लोग और उनके बाद के कांग्रेसीजन जहां सब मत पंथ संप्रदायों के बीच बेकार का संतुलन बनाने और सबको एक जैसा ही घोषित करने की मूर्खतापूर्ण उछलकूद में लगे रहे, उसके विपरीत स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि ये मत, पंत और संप्रदाय ही मनुष्यों को आपस में लड़ा रहे हैं । यहां तक कि भारत की तथाकथित पराधीनता का भी एकमात्र कारण मत, पंथ और संप्रदायों को मानने वाले लोगों का पूर्वाग्रह ही है, जिसके कारण वह भारत के लोगों पर अत्याचार करते रहे हैं।
इस प्रकार स्वामी जी का राष्ट्र जागरण का कार्य अपने आप में अनोखा था। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि स्वाधीन भारत का राजनीतिक नेतृत्व उन लोगों के हाथों में गया जो महर्षि दयानंद जी के विपरीत विचार रखते थे और सभी मत, पंथ और संप्रदायों के राष्ट्र विरोधी विचारों तक से भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं रही बल्कि उन विचारों को भी भाषण और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर वे स्वीकार करने को तत्पर हो गए, जिसका परिणाम आज हम देख रहे हैं कि देश फिर से मत, पंथ और संप्रदायों के पूर्वाग्रहों की दल-दल में धंसता जा रहा है। समय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्वामी दयानंद जी महाराज के विचार आज भी अपने आप में प्रासंगिक हैं। उनके विचारों से ही देश की वर्तमान राजनीतिक ,सामाजिक, धार्मिक समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता है।
जो देश अपने महापुरुषों का सम्मान नहीं कर पाता, वह सभ्यताओं के संघर्ष में अपना अस्तित्व खो बैठता है। इसलिए प्रत्येक जीवंत राष्ट्र अपने आप को सशक्त और समर्थ बनाए रखने के लिए अपने महापुरुषों के महान कार्यों को सदा नमन करता रहता है। उनकी स्मृतियों को शाश्वत बनाए रखने के लिए शाश्वत संघर्ष करता है। श्री राम और श्री कृष्ण के रूप में हमने जिन दो महापुरुषों को अपने लिए प्रेरणा का स्रोत बनाया, उनकी स्मृतियों को जीवंत बनाया उसके पीछे भी यही कारण रहा कि हम उनसे सदा प्रेरणा लेते रहेंगे।
स्वामी दयानंद जी का दिव्य और भव्य व्यक्तित्व हम आर्यों के लिए अर्थात समस्त भारतवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। इसी के दृष्टिगत कार्य उप प्रतिनिधि सभा जनपद गौतम बुद्ध नगर ने अभी हाल ही में बनकर तैयार हुए जेवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम " महर्षि दयानंद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा " रखने का आन्दोलन आरम्भ किया है। यह बहुत ही संतोष और आनंद का विषय है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आर्यों ने ही नहीं अपितु संपूर्ण भारतवर्ष और उससे भी बाहर जाकर विदेशों में भी सक्रिय आर्यजनों ने इस आंदोलन में अपनी सहभागिता देने का विश्वास दिलाया है।
11 अप्रैल 2026 को आर्य प्रतिनिधि सभा जनपद गौतम बुद्ध नगर के आवाहन पर ईशान इंस्टीट्यूट ग्रेटर नोएडा में जिस शानदार कार्यक्रम का आयोजन किया गया, उसमें संपूर्ण भारतवर्ष के ही नहीं अपितु संपूर्ण भूमंडल के आर्य जनों की गूंज सुनाई दी। उनका संकल्प अपनी अभिव्यक्ति दे रहा था। उनकी एकता और महर्षि के प्रति समर्पण की उदात्त भावना नई अंगड़ाई ले रही थी। उनकी संगठन शक्ति नया इतिहास लिखने के लिए आतुर थी। उनका आत्मबल आर्यों की पुरानी परंपरा को दोहराने के लिए उतावला था। लग रहा था कि जैसे सभी उपस्थित आर्यजन फिर से हैदराबाद आंदोलन को दोहराने का मन बना चुके हैं।
मित्रो ! यह सत्य है कि:-


ना हम ईशा के चेले,
ना हम मोहम्मद के चेले ,
ना हम अनुयायी करमचंद के
हम हैं सिपाही दयानंद के....


यह कैसे संभव है कि दयानंद के सिपाही दयानंद के सम्मान के लिए मरना मिटना न जानें ? इन्होंने तो बलिदानियों की समाधियों पर चिरकाल से स्मृतियों के दीप जलाए हैं.... इन्होंने तो बलिदानों की खेती की है... उस खेती को बलिदानों से ही सींचा है... और उस खेती से बलिदानियों को ही जन्म दिया है। इस प्रकार बलिदानों से आर्य समाज का पुराना परिचय है। बलिदानियों के दीपों के ऊपर जलने वाला महान दीपक जिसे ये महर्षि दयानंद के नाम से जानते हैं- बलिदानियों का सूर्य है। .... उसी सूर्य से हम सब प्रेरणा ले रहे हैं... ऊर्जा प्राप्त कर रहे हैं...ऊर्जा के इस अजस्र स्रोत को हम मिटने नहीं देंगे।
भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी से हम सभी आर्यजन यह निवेदन करते हैं कि वह महर्षि दयानंद जी को इतिहास में उनका उचित स्थान और सम्मान सुरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय लें। हम उन्हें सादर स्मरण दिलाना चाहते हैं कि गैलीलियो को जब पोप ने इस बात के लिए गिरफ्तार करा लिया कि उन्होंने पृथ्वी को घूमता हुआ बताया था तो उसने गैलीलियो के लिए यह दंड निर्धारित किया कि जब वह शहर की गलियों से निकलता हुआ जाए तब प्रत्येक व्यक्ति उस पर ईंट पत्थर फेंकेगा। गैलीलियो सभी लोगों के ईंट पत्थर सहता हुआ आराम से चल रहा था। जब वह अपने एक मित्र की गली से गुजरा तो उसके मित्र ने पोप की आज्ञा का पालन करते हुए अपने मित्र गैलीलियो पर एक पुष्प फेंक कर मारा।उसने सोचा था कि इस प्रकार फूल मारने से पोप के आदेश का पालन भी हो जाएगा और तेरे मित्र को कुछ लगेगा भी नहीं। परंतु अन्य लोगों के द्वारा ईंट पत्थर सहन करने वाले गैलीलियो की इस बार चीख निकल गई। यह देखकर उसका मित्र निकट आया और कान में कहने लगा कि मैंने तो फूल मारा है। इस पर गैलीलियो ने कहा कि कोई बात नहीं यदि फूल भी मारा है तो भावना तो मारने की ही रही... इसलिए मुझे शत्रुओं के ईंट पत्थरों ने नहीं रुलाया, तेरी मारने की इस भावना ने रुला दिया। इस पर मित्र बड़ा शर्मिंदा हुआ।
हमारा कहने का अभिप्राय है कि महर्षि दयानंद जी को कांग्रेसियों ने उपेक्षित किया यह तो चल सकता था , परंतु एक गुजराती के रूप में हमारे देश के प्रधानमंत्री महर्षि दयानंद की उपेक्षा करें... यह नहीं चल सकता। दूसरों ने मारा तो दयानंद शांत रह सकता था, परंतु यदि अपने ही मार रहे हैं तो शांत नहीं रहा जा सकता ...इस पर तो प्रत्येक आर्यजन की चीख निकलना स्वाभाविक है। हमारे प्रधानमंत्री जी गुजराती मॉडल की बात करते हैं, आज देश का प्रत्येक आर्यसमाजी गुजराती मॉडल ( अर्थात महापुरुषों का सम्मान करने की प्रधानमंत्री जी की घोषणा ) की यह अनोखी मिसाल स्थापित होते हुए देखना चाहता है कि एक गुजराती के मुखारविंद से ही जेवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम महर्षि दयानंद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा रखा जाए।.... देखते हैं यह इतिहास कब बनता है ? अंत में बस इतना ही:-


कुछ लिखकर सो ,
कुछ पढ़ कर सो,
जहां जगा था आज सवेरे
वहां से कुछ तू बढ़कर सो।



- डॉ राकेश कुमार आर्य
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