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आंतरिक प्रेम

आंतरिक प्रेम

जय प्रकाश कुवंर
आज जिसे देख तुम फुले नहीं समाते हो,
एक दिन इस बदन पर फूल तुम चढ़ाओगे।
आज जिस बदन को तुम तपिश से बचाते हो,
एक दिन उसे धधकती चिता में जलाओगे।।
अपने प्रेम को इस नश्वर शरीर से मत बांधो,
इसे हृदयस्थली के गहराई में उतर जाने दो।
यह शरीर रहे या नहीं रहे इस दुनिया में,
प्रेम ऐसे करो हमसे कि इसे अमर हो जाने दो।।
रात जिस चांद को तुमने चमकते हुए देखा था,
रात ढलने के साथ, चांदनी फीकी पड़ती जा रही है।
जाते जाते हम सांसारिक लोगों को,
चांद चकोर की अमर प्रेम कहानी सुना रही है।।
यह रात भी भले ढल जाएगी, चांद भी छुप जाएगा,
बेचारे इस चकोर को भी, चांद चांदनी नजर नहीं आएगा।
लेकिन इस चांद चांदनी और चकोर की चाहत कथा,
युगों युगों तक, इस दुनिया में अमर रह जाएगा।।

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