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मातृत्व की महिमा: शास्त्रों के दर्शन से आधुनिक काल

मातृत्व की महिमा: शास्त्रों के दर्शन से आधुनिक काल

सत्येन्द्र कुमार पाठक
सृष्टि के आरंभ से ही 'माँ' का अस्तित्व केवल एक संबंध मात्र नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड की आधारशक्ति रहा है। भारतीय संस्कृति में माँ को 'प्रथम गुरु', 'परम देव' और 'प्रकृति' के साक्षात् विग्रह के रूप में स्वीकार किया गया है। जहाँ आधुनिक युग में हम 'मातृ दिवस' के माध्यम से साल में एक दिन माताओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं, वहीं सनातन मनीषा ने प्रत्येक क्षण को मातृ-सेवा के लिए समर्पित किया है। वेदों, पुराणों, स्मृतियों और आधुनिक इतिहास के आलोक में मातृत्व की विराट महत्ता का विश्लेषण करता है।
वेद विश्व के प्राचीनतम ज्ञान के भंडार हैं। इनमें माँ को 'अदिति' कहा गया है, जिसका अर्थ है—अखंड, जिसे विभाजित न किया जा सके। ऋग्वेद का दृष्टिकोण: ऋग्वेद (8.101.15) में माता को स्पष्ट रूप से 'अमृतस्य नाभिः' (अमृत का केंद्र) कहा गया है। वेदों के अनुसार, माता केवल शरीर को जन्म नहीं देती, बल्कि वह बालक के भीतर दिव्य गुणों का सिंचन करती है। अथर्ववेद का प्रसिद्ध मंत्र है— "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः"। यहाँ पृथ्वी को माता मानकर उसके प्रति वही आदर व्यक्त किया गया है जो एक पुत्र अपनी जननी के प्रति करता है। यह वैश्विक मातृत्व की अवधारणा है, जहाँ सम्पूर्ण प्रकृति ही माँ का स्वरूप है। भारतीय दर्शन के शिखर ग्रंथों—उपनिषदों और आचरण नियमावली—स्मृतियों में माँ का स्थान पिता और गुरु से भी ऊपर रखा गया है। तैत्तिरीय उपनिषद: प्रथम आदेश में दीक्षांत उपदेश के समय जब गुरु शिष्य को गृहस्थाश्रम में भेजता है, तो उसका पहला वचन होता है— "मातृदेवो भव" (तैत्तिरीय उपनिषद 1.11.2)। यह निर्देश देता है कि संसार के सभी ज्ञान और कर्मों से पहले माता को देवता मानकर उनकी सेवा करना अनिवार्य है। मनुस्मृति: एक हजार पिताओं का गौरव भगवान मनु ने अपनी स्मृति (2.145) में संबंधों की जो तुलना की है, वह आज भी समाज का पथ-प्रदर्शन करती है:
"सहस्रं तु पितृन्माता गौरवेणातिरिच्यते॥"
अर्थात्: दस आचार्यों से श्रेष्ठ एक पिता है, लेकिन एक हजार पिताओं से भी अधिक गौरवशाली और पूजनीय एक माता है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि माँ के त्याग और समर्पण की तुलना किसी भी भौतिक संबंध से नहीं की जा सकती।
पुराणों में मातृत्व: ममता और वीरता का संगम है। पुराणों ने माँ की महिमा को कहानियों के माध्यम से जन-मानस के हृदय में उतारा है। मार्कंडेय पुराण में रानी मदालसा एक ऐसी माँ के रूप में उभरती हैं, जो अपने बच्चों को पालने में ही लोरी सुनाते हुए ब्रह्मज्ञान देती थीं। उन्होंने सिद्ध किया कि माँ चाहे तो अपने बालक को जन्म से ही 'आत्मज्ञानी' बना सकती है। : स्कंद पुराण में उल्लेख है कि "नास्ति मातृसमा छाया" (माता के समान कोई छाया/शीतलता नहीं है)। यह ग्रंथ मानता है कि जब बालक विपत्ति में होता है, तब संसार के सारे तर्क विफल हो जाते हैं, केवल माँ का आशीर्वाद ही रक्षक बनता है।
आधुनिक काल में मातृ दिवस की शुरुआत 20वीं सदी के प्रारंभ में अमेरिका से हुई। एना जार्विस का संकल्प: 1908 में एना जार्विस ने अपनी दिवंगत माँ की याद में वेस्ट वर्जिनिया में पहला समारोह आयोजित किया। उनकी माँ एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं। एना का उद्देश्य था—पारिवारिक संबंधों और माँ के व्यक्तिगत बलिदान को सम्मान देना।
जुलिया वार्ड होवे और शांति का आह्वान: 1870 में ही जुलिया वार्ड होवे ने 'मदर्स डे प्रोक्लामेशन' के जरिए युद्धों के विरुद्ध माताओं की एकजुटता का आह्वान किया था। उनका मानना था कि माताओं के पास समाज को युद्ध मुक्त बनाने की शक्ति है। यह दिलचस्प है कि एना जार्विस ने ही बाद में इस दिन का विरोध शुरू कर दिया था। उनका मानना था कि कार्ड और महंगे उपहारों ने इस दिन की 'पवित्रता' और 'भावुकता' को खत्म कर दिया है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में मातृत्व के विभिन्न रूप में विश्व के विभिन्न देशों ने मातृत्व को अपनी संस्कृति के अनुसार अलग-अलग तिथियों और पद्धतियों में ढाला है: नेपाल (माता तीर्थ औंशी): हिंदू बाहुल्य देश नेपाल में वैशाख अमावस्या को 'माता तीर्थ औंशी' मनाई जाती है। यहाँ जीवित माताओं को उपहार दिए जाते हैं और दिवंगत माताओं का तर्पण किया जाता है।बोलिविया (ऐतिहासिक वीरता): यहाँ 27 मई को मातृ दिवस मनाया जाता है, जो 1812 के कोरोनिल्ला युद्ध की याद दिलाता है, जहाँ महिलाओं ने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। वियतनाम (ले वू-लैन): चंद्र कैलेंडर के सातवें महीने में यहाँ माताओं के प्रति सम्मान और पितरों की शांति के लिए विशेष पूजा की जाती है। माँ: संस्कारों की जननी है। भारत का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है जहाँ माताओं ने राष्ट्र के भविष्य को बदल दिया। जीजाबाई और शिवाजी: छत्रपति शिवाजी महाराज की वीरता के पीछे माता जीजाबाई की शिक्षाएँ थीं। उन्होंने रामायण और महाभारत के चरित्रों के माध्यम से शिवाजी को राष्ट्र और धर्म की रक्षा का पाठ पढ़ाया। भगवान बुद्ध की माता: महामाया और बाद में गौतमी ने बुद्ध के जीवन को आधार दिया। यहाँ तक कि बौद्ध धर्म में 'प्रज्ञापारमिता' को भी 'माता' के रूप में ही पूजा जाता है।
माँ के ऋण से मुक्ति संभव नहीं है।
आदि शंकराचार्य ने अपने 'देव्य पराधक्षमापन स्तोत्र' में बहुत ही मार्मिक बात कही है— "कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति" (पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं होती)।चाहे हम वेदों की ऋचाएँ पढ़ें या आधुनिक काल के इतिहास को देखें, निष्कर्ष एक ही निकलता है—माँ ईश्वर का वह रूप है जो हमारे सुख के लिए अपनी देह, मन और प्राणों का होम कर देती है। आधुनिक 'मदर्स डे' भले ही पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित हो, लेकिन इसका मूल उद्देश्य भारतीय सनातन मूल्यों के साथ मेल खाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल एक दिन उपहार देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री न करें, बल्कि शास्त्रों के अनुसार आजीवन माँ के प्रति कृतज्ञता और सेवा का भाव रखें।
माँ का आँचल केवल एक वस्त्र नहीं, वह इस धरती का सबसे सुरक्षित आश्रय है। जैसा कि स्कंद पुराण कहता है, माता के समान कोई गति नहीं और माता के समान कोई शरण नहीं।संदर्भ ग्रंथ - ऋग्वेद संहिता - (10.85.46, 8.101.15) , तैत्तिरीय उपनिषद - शिक्षावल्ली (1.11.2) , मनुस्मृति - अध्याय 2 (श्लोक 145) , स्कंद पुराण - कौमारिका खंड , मार्कंडेय पुराण - मदालसा-प्रसंग , इतिहास के झरोखे से: एना जार्विस और आधुनिक मातृ दिवस (ऐतिहासिक आलेख) , मदर डे प्रोक्लामेशन - जुलिया वार्ड होवे 1870


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