धोखे की मानसिकता, मित्रता का पतन और धर्म का शाश्वत न्याय
डॉ. राकेश दत्त मिश्र
मनुष्य का जीवन सिर्फ सांस लेने से नहीं चलता, यह तो एक गहरी यात्रा है जिसमें नैतिकता, समाज और आध्यात्मिकता शामिल हैं। इस यात्रा में हमारे विचार, हमारा व्यवहार और हमारे काम ही हमें परिभाषित करते हैं। लेकिन आजकल एक चिंताजनक बात दिखाई दे रही है—कुछ लोग दूसरों को बेवकूफ बनाकर और धोखा देकर खुद को चतुर और सफल मानते हैं। उन्हें लगता है कि उन्होंने कुछ बड़ा हासिल कर लिया है, जबकि असल में वे अपने ही चरित्र और भविष्य को कमजोर कर रहे हैं।
धर्म के हिसाब से देखा जाए तो साफ है कि धोखा और छल कभी भी असली सफलता का आधार नहीं बन सकते। सनातन धर्म हमेशा से सत्य, अहिंसा, करुणा और धर्मनिष्ठा को जीवन का आधार मानता आया है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं-
“न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति।”
यानी, जो व्यक्ति अच्छे काम करता है, उसका कभी पतन नहीं होता।
इस श्लोक से यह स्पष्ट होता है कि सच्चे और धर्म के अनुसार किए गए काम अंत में अच्छा फल ही देते हैं, जबकि धोखे का रास्ता व्यक्ति को नीचे की ओर ले जाता है।
आज समाज में यह भी देखा जा रहा है कि कुछ लोग समूह में यात्रा करते हैं-चाहे वह धार्मिक यात्रा हो, सामाजिक कार्यक्रम हो या दोस्तों के साथ घूमना। लेकिन उनके दिल में यात्रा का मकसद मजा करना, साधना करना या साथ देना नहीं होता, बल्कि वे दूसरों का फायदा उठाने की सोचते हैं। वे सोचते हैं कि कैसे किसी का विश्वास तोड़कर फायदा उठाया जाए, कैसे किसी को पैसे या दिमाग से लूटा जाए।
यह तरीका न सिर्फ समाज के लिए बुरा है, बल्कि धर्म के मूल सिद्धांतों का भी उल्लंघन है।
चाणक्य नीति में कहा गया है-
“सर्पः क्रूरः खलः क्रूरः सर्पात् क्रूरतरो खलः।”
यानी, सर्प और दुष्ट दोनों ही क्रूर होते हैं, लेकिन दुष्ट व्यक्ति सर्प से भी ज्यादा खतरनाक होता है।
क्योंकि सर्प सिर्फ एक बार डंसता है, लेकिन दुष्ट व्यक्ति बार-बार अपने फायदे के लिए दूसरों को नुकसान पहुंचाता है।
मित्रता को भारतीय संस्कृति में बहुत पवित्र और ऊंचा माना जाता है। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में मित्रता के अच्छे उदाहरण मिलते हैं—जहां दोस्त अपने फायदे को छोड़कर दूसरे के लिए खड़े रहते हैं। लेकिन जब मित्रता के नाम पर धोखा और स्वार्थ का खेल खेला जाता है, तो वह रिश्ता सिर्फ दिखावा बनकर रह जाता है।
ऐसी मित्रता में न तो विश्वास होता है, न इज्जत और न ही स्थिरता। यह सिर्फ फायदा उठाने का एक तरीका होता है, जो समय आने पर टूट जाता है।
धर्म का एक मूल सिद्धांत है-कर्मफल का न्याय। कोई भी व्यक्ति अपने किए का परिणाम से बच नहीं सकता। चाहे वह कितनी भी चतुराई से दूसरों को धोखा दे, अंत में उसे उसके काम का फल जरूर मिलता है।
मनुस्मृति में साफ कहा गया है-
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।”
यानी, जो धर्म को नष्ट करता है, धर्म उसे नष्ट कर देता है; और जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
यह सिर्फ एक पुरानी बात नहीं, बल्कि जीवन का एक सच है।
इसी तरह महाभारत में कहा गया है-
“यथा बीजं तथाऽङ्कुरः।”
यानी, जैसा बीज बोया जाता है, वैसा ही फल मिलता है।
अगर कोई व्यक्ति धोखे और छल का बीज बोता है, तो उसे भी वैसा ही कड़वा फल मिलेगा।
प्रेम के न्याय की व्यवस्था बहुत ही सूक्ष्म और सही होती है। यह जरूरी नहीं कि सजा तुरंत मिले, पर समय के साथ वह जरूर दिखाई देती है। कभी व्यक्ति समाज की निंदा का सामना करता है, कभी मानसिक परेशानी का, और कभी जीवन की परिस्थितियां उसे उसके काम का एहसास करा देती हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
“अधर्मेण जयन्नेव न कदाचन सुखी भवेत्।”
यानी, अधर्म से जीतने से कभी सुख नहीं मिलता।
इसलिए यह जरूरी है कि हम अपने जीवन में धर्म को सिर्फ एक विचार के रूप में न रखें, बल्कि उसे अपने आचरण में लाएं। चाहे यात्रा हो या दोस्ती, व्यापार हो या समाजिक जीवन—हर क्षेत्र में सच्चाई और ईमानदारी को अपनाना ही असली धर्म है।
आज के समय में सबसे बड़ी जरूरत यह है कि हम अपने अंदर झांकें—क्या हम भी कहीं न कहीं स्वार्थ और धोखे की प्रवृत्ति में फंस तो नहीं रहे? क्या हम अपने रिश्तों को सिर्फ उपयोग का साधन तो नहीं बना रहे?
अगर ऐसा है, तो यह समय है खुद को सुधारने का, क्योंकि धर्म का रास्ता मुश्किल जरूर है, पर वही असली सुख और इज्जत देता है।
अंत में, यही कहा जा सकता है कि जो व्यक्ति दूसरों को धोखा देकर खुद को जीता हुआ मानता है, वह असल में अज्ञान के अंधेरे में जी रहा होता है। असली जीत उसी की होती है जो धर्म, सच्चाई और न्याय के रास्ते पर चलता है।
“सत्यमेव जयते”- यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि पूरे जीवन का सार है।
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