सुनो, वसुधा की करुण पुकार
कुमार महेंद्रपेड़-पौधे, जीव-जन्तु,
सदैव मनुज के परम मित्र।
नदियाँ, पर्वत, सागर संग,
स्वर्ग-सदृश सुनहरे चित्र।
सहेज मातृ-वत्सल आभा,
बहती अविरल आनंद-धार।
सुनो, वसुधा की करुण पुकार।।
नैसर्गिक सानिध्य भीतर,
जीवन सदा आह्लादित।
मृदुल, मधुर, मनोरम छवि,
अपनत्व अथाह आच्छादित।
अनूप, अनमोल विरासत संग,
सर्वत्र खुशियाँ सदाबहार।
सुनो, वसुधा की करुण पुकार।।
उत्साह उमंगित हरित आँचल,
सुख-समृद्धि अनंत वरदान।
दुःख-दर्द-कष्टों का विलोपन,
कण-कण करता नव आह्वान।
वृक्षारोपण है धर्म महान,
सहर्ष सक्रिय भागीदारी साकार।
सुनो, वसुधा की करुण पुकार।।
पृथ्वी निहित हमारी शक्ति,
नैतिक कर्तव्य—इसकी देखभाल।
नवीकरणीय ऊर्जा की ओर कदम,
सर्व योगदान बने जीवन की ढाल।
जलवायु-परिवर्तन से बचाव हेतु,
पर्यावरण-रक्षण जीवन-आधार।
सुनो, वसुधा की करुण पुकार।।
पुरजोर विरोध धरा-दोहन का,
संरक्षण हेतु सजग प्रयास।
रोकें प्लास्टिक का अंध उपयोग,
प्रकृति संग उमंग-उल्लास।
समृद्ध, उज्ज्वल भविष्य हेतु,
भू-पटल पर हरित श्रृंगार।
सुनो, वसुधा की करुण पुकार।।
✍️ कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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