सनातन संग सत्संग है
अरुण दिव्यांशसनातन संग सत्संग है ,
सनातन पावन गंग है ,
सनातन तो है सना तन ,
सनातन जीवन जंग है ।
सनातन हेतु गैर नहीं ,
सनातन को है बैर नहीं ,
किंतु कोई उंगली दिखाए ,
उसका भी है खैर नहीं ।
सनातन होता न व्यंग्य है ,
सनातन होता न बेअंग है ,
संत सनातन का अंग है ,
न सोच सनातन बदरंग है ।
सबका यह अपना ढंग है ,
सनातन न कहीं ये तंग है ,
हाथ मिला संग संग चल ,
सनातनी यही तो उमंग है ।
सनातन चला न बेढंग है ,
सनातन स्वयं ही ये चंग है ,
व्योम सुंदर सजाने वाला ,
इन्द्रधनुष यह सप्तरंग है ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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