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भगवान परशुराम: शास्त्र, शस्त्र और चेतना के अक्षय पुंज

भगवान परशुराम: शास्त्र, शस्त्र और चेतना के अक्षय पुंज

सत्येन्द्र कुमार पाठक
शाश्वत अस्तित्व भारतीय वाङ्मय में भगवान परशुराम का व्यक्तित्व एक ऐसे महामानव का है, जिन्होंने काल की सीमाओं को लांघकर 'चिरंजीवी' होने का गौरव प्राप्त किया। वैशाख शुक्ल तृतीया को अवतरित यह दिव्य विभूति केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक महान समाज सुधारक, कृषि विशेषज्ञ, जल-प्रबंधक और शास्त्रवेत्ता थे। उनका जीवन 'अग्रतः चतुरो वेदाः पृष्ठतः सशरं धनुः' के आदर्श को चरितार्थ करता है, जहाँ ज्ञान की सौम्यता और शस्त्र की प्रखरता का अद्भुत समन्वय है। ऋषि भृगु वंश का गौरव भगवान परशुराम का जन्म सप्तऋषियों में से एक महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के यहाँ हुआ था। वे भृगु ऋषि के वंशज होने के कारण 'भार्गव' कहलाए।
तत्कालीन समय में हैहयवंशी राजा सहस्रार्जुन का आतंक अपनी चरम सीमा पर था। सत्ता के मद में चूर होकर जब सहस्रार्जुन ने महर्षि जमदग्नि के आश्रम का विनाश किया और अंततः उनकी हत्या कर दी, तब परशुराम ने अन्याय के विरुद्ध शस्त्र उठाया। भगवान परशुराम का संघर्ष किसी जाति के विरुद्ध नहीं, बल्कि 'आततायी प्रवृत्ति' के विरुद्ध था। उन्होंने २१ बार पृथ्वी को उन राजाओं से मुक्त किया जो प्रजा का रक्षक बनने के बजाय भक्षक बन गए थे। उन्होंने सत्ता के विकेंद्रीकरण का मार्ग प्रशस्त किया।
भारत के मानचित्र पर उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक भगवान परशुराम की उपस्थिति मंदिरों और तीर्थों के रूप में जीवंत है। ये स्थान शोधार्थियों के लिए श्रद्धा और इतिहास के केंद्र हैं। जानापाव कुटी (मध्य प्रदेश) इंदौर के समीप विंध्याचल की पहाड़ियों में स्थित जानापाव को भगवान परशुराम की प्रामाणिक जन्मस्थली माना जाता है। यहाँ से सात नदियाँ निकलती हैं, जो परशुराम जी के प्रकृति प्रेम और जल-प्रबंधन के ज्ञान को दर्शाती हैं। यह स्थान उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा का केंद्र रहा है। परशुराम कुंड (अरुणाचल प्रदेश) में पूर्वोत्तर भारत में लोहित नदी के तट पर स्थित यह कुंड एक प्रमुख तीर्थ है। यह स्थान भारत की अखंडता का प्रतीक है। मान्यता है कि यहाँ स्नान करने से व्यक्ति पापमुक्त होता है। यह पूर्वोत्तर की जनजातीय संस्कृति और सनातनी परंपरा के मिलन का बिंदु है। परशुराम मंदिर, चिपलून (महाराष्ट्र) कोंकण क्षेत्र में स्थित यह मंदिर प्राचीन वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। परशुराम जी ने अपने बाणों से समुद्र को पीछे हटाकर कोंकण की भूमि का सृजन किया था। यहाँ उनकी उपासना 'कोंकण के रक्षक' के रूप में की जाती है।
भगवान परशुराम की प्रासंगिकता केवल भारत तक सीमित नहीं है। 'वसुधैव कुटुंबकम' के भाव से उनकी शिक्षाएं वैश्विक स्तर पर फैलीं: नेपाल (पशुपतिनाथ क्षेत्र): नेपाल के कई प्राचीन मंदिरों में परशुराम जी की मूर्तियाँ स्थापित हैं। हिमालयी क्षेत्र में उन्हें योगेश्वर और तंत्र शास्त्र के आचार्य के रूप में पूजा जाता है। हाल के वर्षों में काठमांडू और अन्य क्षेत्रों में उन्हें 'मातृभाषा रत्न' के प्रतीक के रूप में भी सम्मानित किया गया है। दक्षिण-पूर्व एशिया: कंबोडिया (अंगकोर वाट) और जावा के प्राचीन शिलालेखों में विष्णु के अवतारों के वर्णन में परशुराम का उल्लेख मिलता है। यह दर्शाता है कि प्राचीन काल में भारतीय न्याय संहिता और शस्त्र विद्या (कलारीपयट्टू) इन देशों तक पहुँची थी।
परशुराम जी को केवल युद्ध से जोड़कर देखना अधूरा शोध होगा। उन्होंने एक नए समाज की नींव रखी जिसके मुख्य स्तंभ थे: पृथ्वी को जीतने के बाद उन्होंने समस्त भूमि स्वयं के उपभोग के लिए नहीं रखी, बल्कि उसे महर्षि कश्यप को दान कर दिया। यह सत्ता के प्रति अनासक्ति का विश्व इतिहास में सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने विजयी होकर भी 'त्यागी' की भूमिका चुनी। कोंकण और मालाबार तट पर समुद्र से भूमि प्राप्त करना उनके उन्नत भू-वैज्ञानिक ज्ञान का प्रमाण है। उन्होंने बंजर भूमि को उपजाऊ बनाकर समुदायों को बसाया और उन्हें आत्मनिर्भर बनाया। वे बच्चों और युवाओं के लिए आदर्श गुरु थे। उनकी शिक्षाओं में नैतिक मूल्यों और साहस का समावेश था। आज भी बच्चों के साहित्य में उनके जीवन को 'चरित्र निर्माण' के लिए आधार बनाया जाता है।
अक्षय तृतीया की तिथि और परशुराम जन्मोत्सव का एक साथ होना यह संदेश देता है कि जो कर्म न्याय और धर्म के लिए किए जाते हैं, वे 'अक्षय' (अविनाशी) होते हैं। शाश्वत अस्तित्व: परशुराम 'अष्टचिरंजीवी' में से एक हैं। उनका अस्तित्व यह विश्वास दिलाता है कि सत्य कभी पराजित नहीं होता। अक्षय तृतीया पर दान और पुण्य की परंपरा परशुराम जी के उस त्याग की याद दिलाती है जब उन्होंने पूरी पृथ्वी का दान कर दिया था।
आज के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में, जहाँ संघर्ष और असुरक्षा का वातावरण है, परशुराम के सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक हैं:
शक्ति शांति के लिए: "शस्त्र" का उद्देश्य दमन नहीं, बल्कि रक्षा होना चाहिए। सांस्कृतिक एकता: उन्होंने उत्तर से दक्षिण तक भारत को एक सूत्र में पिरोया। उनका जीवन संदेश देता है कि जब सत्ता निरंकुश हो जाए, तो बौद्धिक वर्ग को समाज की रक्षा के लिए आगे आना चाहिए।
भगवान परशुराम केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता और वैश्विक न्याय के जीवंत स्तंभ हैं। भारत के विभिन्न कोनों में स्थित उनके मंदिर उस अमोघ संकल्प की चौकियाँ हैं जो अधर्म के विनाश की घोषणा करती हैं। उनके वैश्विक उपासना केंद्रों का विस्तार इस बात का प्रमाण है कि न्याय और सत्य की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती।
परशुराम जी का जीवन हमें सिखाता है कि व्यक्ति को शास्त्र (ज्ञान) में पारंगत और शस्त्र (सामर्थ्य) में सक्षम होना चाहिए। अक्षय तृतीया पर उनकी आराधना हमें शक्ति, विवेक और लोक-कल्याण के अक्षय पथ पर चलने की प्रेरणा देती है।
संदर्भ: ब्रह्मांड पुराण: भार्गव चरित श्रीमद्भागवत महापुराण: नवम स्कंध महाभारत: शांति पर्व (राजधर्म अनुशासन) , क्षेत्रीय गजेटियर: मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं अरुणाचल प्रदेश पर्यटन विभाग , समकालीन शोध आलेख: मगध एवं कोंकण का ऐतिहासिक भूगोल
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