उम्र के साथ बदलना भी ज़रूरी है,
डॉ अ कीर्ति वर्द्धनउम्र के साथ बदलना भी ज़रूरी है,
वक्त के साथ चलना भी जरूरी है।
सुबह दोपहर शाम फिर रात होती,
भोर के लिये रात ढलना भी जरूरी है।
क्यों करें चिन्ता, यूँ बदलने की हम,
बच्चे थे कभी, अब युवा हो गये हम।
जवानी का जोश, कभी ढल जायेगा,
बुढ़ापे की ओर अग्रसर हो रहे हैं हम।
बचपन की मासूमियत भी खो गयी,
जवानी की चमक धुँधली हो गयी।
रंग रूप सौन्दर्य भी तो ढलने लगा है,
झुर्रियाँ बढ़ीं तन पर, रोशनी खो गयी।
हम भी कहाँ हम रहे, अब पहले की तरह,
खेलते अब कहाँ हम, सब पहले की तरह।
ज़िम्मेदारियों से मुक्त, जब तक बेटे भाई थे,
अब कहाँ मुक्त रहे हैं, हम पहले की तरह?
वक्त के साथ- साथ, दायित्व बढ़ते गये,
ज़िम्मेदारी बढ़ती गयी, हम भी दबते गये।
मस्तियाँ अल्हड़पना, जाने कहाँ खो गये,
नित नये प्रतिमान, ज़िन्दगी के गढ़ते गये।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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