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पृथ्वी वैश्विक संस्कृति और भविष्य का संरक्षण

पृथ्वी वैश्विक संस्कृति और भविष्य का संरक्षण

सत्येंद्र कुमार पाठक।
ब्रह्मांड के अनंत विस्तार में पृथ्वी केवल एक ग्रह नहीं है; यह जीवन की प्रयोगशाला, चेतना का आधार और अरबों प्रजातियों का साझा घर है। आज जब हम 22 अप्रैल 2026 को 'विश्व पृथ्वी दिवस' मना रहे हैं, तो यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आत्म-मंथन का क्षण है। मानव सभ्यता ने 'सतयुग' की सात्विकता से 'कलियुग' की औद्योगिक आपाधापी तक का जो सफर तय किया है, उसमें पृथ्वी के प्रति हमारा दृष्टिकोण श्रद्धा से बदलकर शोषण तक पहुँच गया है। यह आलेख पृथ्वी के ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास का एक विस्तृत दस्तावेज़ है।
युगों का चक्र और पृथ्वी का स्वरूप में वैदिक एवं पौराणिक काल (सतयुग से द्वापर तक)
भारतीय मनीषा में पृथ्वी को 'वसा' (निवास) और 'अनंता' कहा गया है।सतयुग: में मनुष्य और प्रकृति के बीच कोई द्वंद्व नहीं था। उपनिषदों के अनुसार, "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (सब कुछ ईश्वर का ही रूप है) के भाव ने पृथ्वी के कण-कण को पूजनीय बनाया।त्रेता और द्वापर: में भगवान राम का वनगमन और भगवान कृष्ण की लीलाएं प्रकृति के संरक्षण का सबसे बड़ा उदाहरण हैं। गोवर्धन पूजा वास्तव में एक पारिस्थितिक आंदोलन था, जहाँ कृष्ण ने इंद्र (वर्षा के देवता) के अहंकार को चुनौती देकर पर्वत और वनों की पूजा करने का संदेश दिया, क्योंकि वही समाज के वास्तविक पोषणकर्ता थे।स्मृति ग्रंथ और दंड विधान के अनुसार 'मनुस्मृति' और 'याज्ञवल्क्य स्मृति' में पर्यावरण के प्रति अपराधों के लिए कठोर दंड का प्रावधान था। वनों को काटना या जलाशयों को दूषित करना 'महापातक' (बड़ा पाप) माना जाता था। कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में तो बकायदा 'वन रक्षक' और 'अभयारण्य' (Abhayaranya) की अवधारणा मिलती है, जो आज के नेशनल पार्क्स का प्राचीन रूप है।
पृथ्वी के प्रति सम्मान केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दुनिया की हर महान संस्कृति ने इसे ईश्वर की अनुपम कृति माना है। अथर्ववेद का 'पृथिवी सूक्त' विश्व का पहला पर्यावरण घोषणापत्र है। इसमें ऋषि प्रार्थना करते हैं कि हे माता! हम आपकी खुदाई वहीं तक करें जहाँ तक आप उसे पुनः भर सकें, हम आपके मर्म (हृदय) को चोट न पहुँचाएं।
बौद्ध और जैन दर्शन: अहिंसा परमो धर्मः जैन धर्म: भगवान महावीर ने 'अपर्रिग्रह' (जरूरत से ज्यादा संचय न करना) का सिद्धांत दिया, जो आज के 'सस्टेनेबल कंजम्पशन' का आधार है।बौद्ध धर्म: भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति एक वृक्ष (बोधि वृक्ष) के नीचे हुई। बौद्ध धम्म में प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व (Co-existence) को मोक्ष का मार्ग माना गया है।। अब्राहमिक धर्म (ईसाई, इस्लाम, यहूदी) बाइबल: में कहा गया है कि ईश्वर ने मनुष्य को पृथ्वी का 'स्टुअर्ड' (प्रबंधक) बनाया है, न कि स्वामी। पृथ्वी की देखभाल करना एक धार्मिक कर्तव्य है। कुरान: इस्लाम में पृथ्वी को 'मिज़ान' (संतुलन) कहा गया है। कुरान के अनुसार, "अल्लाह ने जमीन और आसमान को एक संतुलन में बनाया है, तुम उस संतुलन को बिगाड़ो मत।"यहूदी धर्म: यहाँ 'बाल ताशचित' (Bal Tashchit) का सिद्धांत है, जिसका अर्थ है "व्यर्थ में विनाश न करना। सिख धर्म: गुरु नानक देव जी ने कहा, "पवणु गुरु पाणी पिता माता धरति महतु"। यहाँ हवा को गुरु, पानी को पिता और धरती को माता का दर्जा दिया गया है। पारसी (जोरोस्ट्रियन): इस धर्म में जल, अग्नि और मिट्टी की पवित्रता को बनाए रखना ही सबसे बड़ी इबादत है ।
मुगल शासक प्रकृति प्रेमी थे। उन्होंने 'चारबाग' पद्धति को विकसित किया। कश्मीर के शालीमार बाग से लेकर आगरा के उद्यानों तक, उन्होंने जल प्रबंधन और वृक्षारोपण को वास्तुकला का हिस्सा बनाया। हालांकि, यह संरक्षण से ज्यादा विलासिता का हिस्सा था, लेकिन इसने स्थानीय वनस्पतियों को फलने-फूलने का अवसर दिया।
ब्रिटिशकाल: के आगमन के साथ पृथ्वी को 'संसाधन' (Resource) के रूप में देखा जाने लगा।।औद्योगिक क्रांति: लकड़ी के लिए भारत के सघन वनों को काटा गया। कानून: 1865 और 1894 के वन कानूनों ने आदिवासियों और स्थानीय समुदायों को उनके प्राकृतिक घरों से बेदखल कर दिया। यही वह समय था जब पृथ्वी का संतुलन पहली बार खतरनाक रूप से बिगड़ा। आज हम 'एन्थ्रोपोसीन' युग में जी रहे हैं, जहाँ मनुष्य की गतिविधियाँ पृथ्वी के भविष्य को तय कर रही हैं। 1970 में शुरू हुआ 'पृथ्वी दिवस' इसी शोषण के खिलाफ एक वैश्विक विद्रोह था।
ग्लोबल वार्मिंग आज एक हकीकत है। भारत ने 2070 तक 'नेट जीरो' का लक्ष्य रखा है। इसका अर्थ है कि हम अपनी कार्बन उत्सर्जन और उसे सोखने की क्षमता के बीच संतुलन बनाएंगे। सौर ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन इस दिशा में मील का पत्थर है। यह 'प्रो-प्लैनेट पीपल' बनने का आह्वान है। हमारी छोटी-छोटी आदतें—जैसे पानी बचाना, प्लास्टिक का त्याग और जैविक उत्पादों का उपयोग—एक बड़ी है। नमामि गंगे: नदियों को केवल नाला बनने से बचाना ही काफी नहीं है, बल्कि उनके पारिस्थितिक तंत्र को पुनर्जीवित करना आवश्यक है।: रासायनिक खादों ने मिट्टी की आत्मा (जीवांश) को खत्म कर दिया है। 'शून्य बजट प्राकृतिक खेती' न केवल जहरमुक्त भोजन देगी, बल्कि मिट्टी को फिर से उपजाऊ बनाएग।।'विकसित भारत' केवल 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का नाम नहीं है। एक सच्चा विकसित राष्ट्र वह है जिसके पास समृद्ध जैव विविधता हो। भारत आज जी-20 (G20) जैसे मंचों पर 'वसुधैव कुटुंबकम' का नेतृत्व कर रहा है। हमें केवल वर्तमान संसाधनों को बचाना नहीं है, बल्कि उन्हें बढ़ाना है (जैसे मियावाकी पद्धति से वन उगाना)।: नई शिक्षा नीति में पर्यावरण को एक विषय नहीं, बल्कि जीवनशैली के रूप में शामिल करना होगा।
पृथ्वी दिवस हमें याद दिलाता है कि डायनासोर जैसे शक्तिशाली जीव भी विलुप्त हो गए थे क्योंकि वे प्रकृति के साथ तालमेल नहीं बिठा सके। मनुष्य के पास बुद्धि है, लेकिन क्या उसके पास विवेक है? आज, 22 अप्रैल 2026 को, हम यह शपथ लें कि हम पृथ्वी के 'उपभोक्ता' नहीं, बल्कि 'संरक्षक' बनेंगे। सतयुग की श्रद्धा और आधुनिक युग के विज्ञान का समन्वय ही वह मार्ग है, जिससे हम आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित, हरी-भरी और जीवंत वसुंधरा सौंप सकेंगे। "पृथ्वी हमारी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है, लेकिन हमारे लालच के लिए नहीं।"संदर्भ: 1. ऋग्वेद एवं अथर्ववेद (पृथ्वी सूक्त) , 2. संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य (SDGs 2030)3. भारत सरकार की 'मिशन लाइफ' और 'नमामि गंगे' रिपोर्ट (2025-26)4 , . वैश्विक जलवायु परिवर्तन सूचकांक
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