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महाप्रभु आदि शकराचार्य की जयन्ती पर -ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या

महाप्रभु आदि शकराचार्य की जयन्ती पर -ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या

डॉ सच्चिदानन्द प्रेमी
अद्वैत वेदांत के सिद्धांत के माध्यम से पूरी दुनिया को 'एकात्म बोध' का मार्ग दिखाने वाले आदि शंकराचार्य भारतीय दर्शन और अध्यात्माकाश के एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने न केवल हिंदू धर्म को पुनर्जीवित किया, बल्कि सम्पूर्ण सनातन धर्म को तिरोहित होने से बचाया ।उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को मापने का कोई पैमाना नहीं है ।मात्र इतना ही कि दूसरा शंकर अभी तक पैदा नहीं हुआ ।ऐसे माहापुरुष विशेष कार्य के लिए ही अवतरित होते हैं ।इसीलिए इन्हें भगवान शंकर का अवतार माना जाता है । अल्पायु में ही असिमित ज्ञान, वैराग्य और सनातन के संचार प्रचारित बौद्ध धर्म की कमर तोड़ कर रख दी थी मात्र 8 वर्ष की आयु में हि चारों वेदों का ज्ञान प्राप्त कर किया था ,बारह वर्ष में सभी शास्त्रों में पारंगत हो गए थे और सोलह वर्ष की आयु तक उन्होंने अपने प्रमुख भाष्यों की रचना कर इन्होने असाधारण प्रतिभा का परिचय दिथा था।
बहुत छोटी उम्र में ही गृहत्याग कर गुरु गोविंद भगवत्पाद जी महाराज से नर्मदा के तट पर दीक्षा लेकर संन्यास धारण कर लिया था ।उन्होंने सम्पूर्ण भारत को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बांधने हेतु भारत की चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की थी
.शंकराचार्य का कार्य मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है -
. भाष्य
उन्होंने 'प्रस्थानत्रयी' (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता) पर गहन भाष्य लिखे। इनका मुख्य उद्देश्य अद्वैतवाद को तार्किक रूप से स्थापित करना था।
ब्रह्मसूत्र भाष्य: यह उनका सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक कार्य माना जाता है।
अद्वैत वेदांत का सिद्धांत
- ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः"
(ब्रह्म ही सत्य है, यह जगत मिथ्या/परिवर्तनशील है और जीव साक्षात् ब्रह्म ही है, उससे अलग नहीं।)
शंकराचार्य के दर्शन का सार एक वाक्य में समाहित है:
अद्वैत वेदांत के अनुसार, 'ब्रह्म' ही एकमात्र परम सत्य है। वह निर्गुण (बिना किसी गुण के), निराकार (बिना किसी आकार के) और सर्वव्यापी है। वह न जन्म लेता है और न ही उसका अंत होता है। वह 'सच्चिदानंद' है—अर्थात सत् (अविनाशी), चित् (चेतना) और आनंद (परम सुख)। है ।
इस दर्शन का सबसे क्रांतिकारी पक्ष यह है कि हमारी आत्मा (जीव) और परमात्मा (ब्रह्म) अलग-अलग नहीं हैं।
अज्ञानता के कारण हमें लगता है कि हम एक सीमित शरीर हैं।
जैसे ही ज्ञान प्राप्त होता है, यह बोध हो जाता है कि "अयमात्मा ब्रह्म" (यह आत्मा ही ब्रह्म है) और "तत्त्वमसि" (वह ब्रह्म तुम ही हो)।
यहाँ प्रश्न उठता है कि
अगर केवल ब्रह्म सत्य है, तो यह संसार हमें इतना वास्तविक क्यों लगता है? आचार्य इसका उत्तर देते हैं - माया' ! माया वह शक्ति है जो सत्य पर पर्दा डाल देती है।
शंकराचार्य ने इसे 'रस्सी और साँप' के उदाहरण से समझाया है।अंधेरे में एक रस्सी साँप की तरह दिखाई देती है। जब प्रकाश (ज्ञान) आता है, तो साँप गायब हो जाता है और केवल रस्सी बचती है। ठीक वैसे ही अज्ञानता के कारण हमें ब्रह्म की जगह यह संसार दिखाई देता है।
यह अद्वैत वेदांत भारतीय दर्शन की सबसे प्रभावशाली और गहरी विचारधारा है। 'अद्वैत' ,यानी जो दो नहीं है" ।
इस अद्वैत के मुख्य सिद्धांतों को हम निम्नलिखित स्तंभों के माध्यम से समझ सकते हैं:
1.. सत्ता के तीन स्तर -
शंकराचार्य ने सत्य को समझने के लिए तीन श्रेणियां बताई हैं: ।.मोक्ष कर्म या केवल कर्मकांड से नहीं, बल्कि 'ज्ञान' से प्राप्त होता है। जब मनुष्य को यह अनुभव (साक्षात्कार) हो जाता है कि वह शरीर नहीं बल्कि अनंत चेतना है, तब वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। यानी जीवित रहते हुए ही मोक्ष का अनुभव किया जा सकता है ।
"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या" सिद्यान्त के अनुसार, जगत 'मिथ्या' है, इसका अर्थ यह नहीं कि यह है ही नहीं; बल्कि इसका अर्थ यह है कि यह 'सदा' रहने वाला नहीं है और ब्रह्म पर आधारित है।
दार्शनिक होने के साथ-साथ वे एक उच्च कोटि के कवि भी थे। उन्होंने भक्ति मार्ग को सरल बनाने के लिए कई स्तोत्रों की रचना:की थी जिनमें प्रमुख हैं –
चर्पटपञ्जरिका ,सौंदर्य लहरी और शिवानंद लहरी: देवी शक्ति और भगवान शिव की स्तुति।
* निर्वाण षटकम ।
* भज गोविंदम भज गोविंदम भज गोविंदम मूढ़ मते " से मोह-माया से मुक्ति का संदेश दिया वहीं "चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं" के माध्यम से स्वयं के स्वरूप का बोध कराया ।
भारत की एकता के लिए उन्होंने चार दिशाओं में चार पीठ स्थापित किए -
क - उत्तर में ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ)
ख - दक्षिण में श्रृंगेरी शारदा पीठ (रामेश्वरम)
ग - पूरब में गोवर्धन मठ (पुरी)
घ - पश्चिम में द्वारका शारदा पीठ (द्वारका)
मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने जो कार्य किया, वह सदियों तक मानवता का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा। उन्होंने तर्क और शास्त्रार्थ के माध्यम से शून्यवादिता और रूढ़िवादिता को चुनौती दी और सनातन धर्म के वास्तविक स्वरूप को पुनः स्थापित किया ।
आज उनकी जयंती है । "जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़ई आकाश " ऩ्याय के माध्यम से "करन पुनीत हेतु निज वानी "कुछ निवेदन किया है ।परंतु दुखद तो यह है कि कहीं भी घनघोर रूप से उनकी जयन्ती नहीं मनाई गई ।और ऐसा इसलिए कि वे राजभोगी नहीं थै ,सत्ता की कामना नहीं थी ।बस इतना ही -
नाहं कामये राज्यं ना जन्मं ना पुनर्भवम् ।
कामये दुःख तप्तानां प्राणिनामार्त नाशनम् ॥ मेरा शत् सहस्राधिक शत् नमन ।
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