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तुझ पर हर रंग खिल रहा

तुझ पर हर रंग खिल रहा

कुमार महेन्द्र
लाल रंग की साड़ी में,
नेह-मृदुल मधुर परिभाषा।
महत्वाकांक्षी तेरे विचार,
उत्साह, जोश, शौर्य की भाषा।
धारण जब पीत वसन,
अंग-अंग स्वर्णिम उजास मचल रहा।
तुझ पर हर रंग खिल रहा।।


हरित वर्ण की चुनरिया संग,
ताजगी की सजीव अनुभूति।
बैंगनी आभा वस्त्रों में,
ज्ञान, शांति, दिव्य ज्योति।
धारण जब कृष्ण चीर,
अंतर का यथार्थ पिघल रहा।
तुझ पर हर रंग खिल रहा।।


भूरी वेशभूषा की झलक में,
ईमानदार, निश्छल सी चितवन।
श्वेत आभा के पटल तले,
विमलता, सादगी का स्पंदन।
गुलाबी सी मोहक मुस्कान,
हर क्षण मधुर आनंद मिल रहा।
तुझ पर हर रंग खिल रहा।।


नीले वर्ण की पोशाक में,
जीवन चंचल, गतिमान।
नवरंगी अंबर की छटा,
प्रखरता संग शक्तिमान।
नारंगी रश्मियों की छवि में,
नव यौवन झिलमिल रहा।
तुझ पर हर रंग खिल रहा।।


कुमार महेन्द्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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