पुस्तक दिवस
अरुण दिव्यांशलालसा भरा जब ज्ञान का ,
मिला न पुस्तक का जवाब ।
निर्धन शक्ति कहाॅं पढ़ने की ,
पुस्तक महत्व जाने नवाब ।।
पुस्तक मूल है जीवन का ,
पहुॅंचाए पूस से पोष तक ।
पुस्तक वह जीवन रत्न है ,
जो पहुॅंचाए कई पुश्त तक ।।
पुस्तक कभी बेकार नहीं,
पुस्तक को बेकरार होते हैं ।
लग जाए बदले जो मूल्य ,
जन जन में स्वीकार होते हैं ।।
पुस्तक पुस्तक ही नहीं यह ,
पूस तक से कई पुश्त तक ।
निर्धन से आगे अमीर तक ,
औ ढीले से ले चुश्त तक ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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