माँ नर्मदा की पावन गोद में आत्मिक एवं आध्यात्मिक यात्रा
सत्येन्द्र कुमार पाठक।
भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत में 'ज्योतिर्लिंग' का स्थान सर्वोपरि है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से चतुर्थ ज्योतिर्लिंग 'ओंकारेश्वर' का उल्लेख स्कंद पुराण सहित अनेक धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में नर्मदा नदी के तट पर बसा ओंकारेश्वर न केवल एक तीर्थ है, बल्कि यह वह पावन स्थान है जहाँ स्वयं प्रकृति 'ॐ' का आकार धारण कर ईश्वर के साक्षात अस्तित्व का प्रमाण देती है। मांधाता पर्वत (शिवपुरी द्वीप) पर स्थित यह दिव्य स्थान श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है। 19 और 20 अप्रैल 2026 की मेरी यह यात्रा केवल एक पर्यटन नहीं, बल्कि स्व-खोज, शांति की तलाश और भक्ति का एक जीवंत अनुभव थी।
मेरी यात्रा 19 अप्रैल 2026 की संध्या 5 बजे शुरू हुई। इंदौर से चार पहिया वाहन से जब मैं ओंकारेश्वर पहुँचा, तो विंध्याचल की पहाड़ियों के बीच बहती माँ नर्मदा का दृश्य हृदय को मोह लेने वाला था। इंदौर-खंडवा राजमार्ग से गुजरते हुए जैसे ही नर्मदा के दर्शन हुए, यात्रा की सारी थकान एक पल में मिट गई। होटल में विश्राम के पश्चात, संध्या 7 बजे मैं सीधे माँ नर्मदा के घाट पर पहुँचा। नर्मदा का स्पर्श ही अपने आप में परम पावन है। यहाँ की हवाओं में एक ऐसा सकारात्मक कंपन था कि मन अनायास ही शांत हो गया। संध्या आरती की तैयारी और नर्मदा जल की शीतलता ने मुझे उस आध्यात्मिक वातावरण में पूरी तरह विलीन कर दिया। ओंकारेश्वर एवं ममलेश्वर का दिव्य संगम में 20 अप्रैल की प्रातःकालीन बेला अत्यंत मंगलकारी थी। ओंकारेश्वर की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक आप ओंकारेश्वर और ममलेश्वर दोनों के दर्शन न कर लें। श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग: मांधाता द्वीप (शिवपुरी) पर स्थित भगवान शिव के स्वयंभू लिंग का दर्शन करना किसी बड़े सौभाग्य से कम नहीं था। मंदिर की पाँच मंजिला संरचना, नागर शैली की वास्तुकला और गर्भ गृह में विराजमान शिव का वह शांत स्वरूप—जो 33 कोटि देवताओं का निवास स्थान माना जाता है—अद्भुत था। जल, बेलपत्र और पुष्प अर्पित करते समय मुझे अहसास हुआ कि हम एक ऐसे स्थान पर हैं जहाँ समय ठहर सा गया है। मान्यता है कि शिव यहाँ प्रतिदिन विश्राम करते हैं, जिसका आभास गर्भगृह की ऊर्जा में स्पष्ट होता था। ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग: मुख्य भूमि पर नर्मदा के दक्षिणी तट पर स्थित ममलेश्वर महादेव, जिन्हें 'अमरेश्वर' भी कहा जाता है, ज्योतिर्लिंग का अभिन्न हिस्सा हैं। ममलेश्वर की भव्यता और यहाँ की शांति ने मुझे एक अलग ही दार्शनिक गहराई प्रदान की। ओंकारेश्वर और ममलेश्वर के दर्शन ने मन को तृप्ति से भर दिया।
ज्योतिर्लिंग दर्शन के बाद मेरी अगली मंजिल 'नर्मदा-कावेरी संगम' थी। ओंकार पर्वत के पीछे स्थित यह संगम स्थल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक महत्व के लिए विख्यात है। मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित यह स्थान एक हल्की ढलान वाली पगडंडी से पहुँचा जा सकता है। यहाँ नर्मदा और कावेरी नदियों का मिलन होता है। कहते हैं कि यहाँ स्नान करने से व्यक्ति के सभी पापों का शमन होता है। मैंने यहाँ पवित्र जल में स्नान किया और ध्यान मुद्रा में बैठा। जल की ध्वनि किसी संगीत जैसी प्रतीत हो रही थी। यहाँ की पूजा-अर्चना के बाद मन में अद्भुत शांति का उदय हुआ। नर्मदा कावेरी नदी संगम के समीप ही स्थित 'ऋण मुक्तेश्वर मंदिर' ओंकारेश्वर के सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है। यहाँ की मान्यता है कि यदि भक्त श्रद्धापूर्वक यहाँ चने की दाल अर्पित करे, तो वह समस्त सांसारिक और आर्थिक ऋणों से मुक्त हो जाता है।मैंने अत्यंत श्रद्धा के साथ चने की दाल खरीदी और भगवान ऋण मुक्तेश्वर को समर्पित की। इसके पश्चात समीप ही स्थित गणपति और द्वारकाधीश के दर्शन किए। यहाँ की ऊर्जा उन लोगों के लिए एक औषधि के समान है जो जीवन के भारी बोझ और चिंताओं से मुक्त होना चाहते हैं। ओंकारेश्वर मंदिरों का एक विशाल संग्रह है, जहाँ हर मंदिर की अपनी एक अलग गाथा है: सिद्धनाथ मंदिर मांधाता द्वीप के ऊपरी भाग में स्थित है। इसके स्तंभों पर उकेरी गई हाथियों की कतारें और मंदिर की अष्टभुजी शैली देखकर तत्कालीन वास्तुकला की भव्यता का अनुमान लगाया जा सकता है। गौरी सोमनाथ मंदिर: का विशाल शिवलिंग अद्वितीय है। यह स्थान न केवल धार्मिक बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।आदिगुरु शंकराचार्य की गुफा स्थान मुझे सबसे अधिक प्रिय लगा। यहाँ वह स्थान है जहाँ आदि गुरु ने अपने गुरु गोविंद भगवत्पाद से शिक्षा ग्रहण की थी। उस स्थान पर बैठना जहाँ से अद्वैत वेदांत का संदेश पूरे विश्व में प्रसारित हुआ, मेरी यात्रा का सबसे प्रेरणादायक क्षण था। यात्रा का समापन नर्मदा की भव्य आरती के साथ हुआ। यह आरती केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि साक्षात माँ नर्मदा की वंदना थी। जलते हुए दीपों की रोशनी जब नदी के जल में प्रतिबिंबित हुई, तो पूरी नदी स्वर्णमयी आभा से जगमगा उठी। नर्मदा में स्थित भगवान शिव के लिंग और नंदी की उपासना की। अपने सिर और शरीर पर माँ नर्मदा का जल छिड़कते ही मुझे ऐसी शांति और आनंद की अनुभूति हुई जो शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। आरती में शामिल होना, माँ को दीप अर्पण करना और उस दिव्य वातावरण में स्वयं को विलीन कर देना—यह मेरी यात्रा की सबसे सुखद स्मृति रही।
ओंकारेश्वर की यात्रा मन को शुद्ध करने वाली और एक नई ऊर्जा से भरने वाली थी। यह स्थान हमें सिखाता है कि जीवन की भागदौड़ में भी शांति का केंद्र कहीं भीतर ही है। नर्मदा के तट पर खड़े होकर मैंने यह अनुभव किया कि भगवान शिव वास्तव में 'ओंकार' (ॐ) के रूप में कण-कण में विद्यमान हैं। यह तीर्थ केवल पूजा का स्थान नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी पाठशाला है जहाँ धैर्य, समर्पण और सादगी का पाठ पढ़ाया जाता है। यदि आप भी अपने जीवन में शांति और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास की तलाश में हैं, तो ओंकारेश्वर की यात्रा अवश्य करें। यहाँ का कण-कण 'नर्मदे हर' की गूंज के साथ आपको जीवन का सही अर्थ समझा देगा।संदर्भ: ओंकारेश्वर मांधाता तीर्थ महात्म्य, स्कंद पुराण, स्थानीय संस्कृति एवं परंपराएं।
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