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राम वन गमन - करुण छंद

राम वन गमन - करुण छंद

✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"

सूनी भई अयोध्या नगरी, मौन हुए सब राज-द्वारे।
बुझते दीपक, फीके आँगन, व्याकुल जन-मन रहे सहारे।।
विह्वल मातु कौसल्या बैठी, दसरथ हृदय व्यथा हारे,
लक्ष्मण संग सिया वन-पथ पर, राम चले दृग नीर बहाए।।
मंद पवन भी थम-सा जाता, झुकते मेघ गगन के सारे,
काँपे पात-पात वनतरु के, धरती बोझ विरह का धारे।।
जन-जन मन में उठे पुकारे—कहाँ गए रघुवर हमारे?
छोड़ि नगर सब धाम सुहावन, वन में फिरत प्रजा के प्यारे।।
कल-कल नदियाँ स्वर को रोके, स्तब्ध हुए गिरिराज शिखर,
काल ठहर कर देख रहा है, धर्म-पथ का यह उज्ज्वल स्वर।।
सुर भी मौन, सकल सृष्टि स्तब्ध, व्यथा व्याप्त अंबर से धारा,
वन-पथ आज बना तप-दीक्षा, मर्यादा का दीपक धारा।।


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