Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

"शोर के बीच बची हुई आवाज़"

"शोर के बीच बची हुई आवाज़"

पंकज शर्मा
रिश्ते—
अब किसी पुराने औज़ार की तरह
दीवार पर टंगे हैं,
जिन्हें हम याद तो करते हैं,
पर इस्तेमाल करने से डरते हैं।


हर आदमी अपनी-अपनी ढपली लेकर
सड़क पर उतर आया है—
सुर का कोई अनुशासन नहीं,
बस शोर है
और उस शोर में डूबती हुई पहचान।


कठिन है—
साथ रहना,
क्योंकि साथ रहने का अर्थ
अब समझौता नहीं,
बल्कि
अपने ‘मैं’ की हत्या जैसा लगता है।


हम बोलते बहुत हैं—
इतना कि शब्दों की हड्डियाँ टूट गई हैं,
और सुनना…
वह तो जैसे किसी विलुप्त भाषा का व्याकरण हो।


जब आँखें देखना छोड़ देती हैं
और कान सिर्फ़ चयन करने लगते हैं,
तब सच
दरवाज़े के बाहर खड़ा रह जाता है—
अनाम, अस्वीकृत।


रिश्ते तब भी बच सकते थे—
अगर हम
अपने भीतर के शोर को
थोड़ी देर के लिए
मौन में रख देते।


पर यहाँ हर कोई
अपनी ही अदालत में न्यायाधीश है,
और हर फैसला
पहले से लिखा हुआ है—
बिना सुनवाई के।


इसलिए अब
संबंधों का यह संसार
सभ्य तो दिखता है,
पर भीतर से
धीरे-धीरे
खोखला होता हुआ एक घर है।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ