कारुष प्रदेश: आदि-सांस्कृतिक उद्भव
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय उपमहाद्वीप के मानचित्र पर गंगा, सोन और कर्मनाशा नदियों के मध्य स्थित भूभाग, जिसे प्राचीन काल में 'कारुष प्रदेश' कहा जाता था, केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है। यह सभ्यता के उदय, ऋषि संस्कृति के विस्तार, असुर शक्तियों के दमन और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की चेतना का केंद्र रहा है। वैवस्वत मनु के पुत्र करुष से लेकर बाबू कुंवर सिंह की तलवार तक, यह प्रदेश निरंतर भारत की नियति को गढ़ता रहा है।
वैवस्वत मन्वंतर और करुष:- पुराणों के अनुसार, सृष्टि के वर्तमान चक्र 'वैवस्वत मन्वंतर' में राजा वैवस्वत मनु के नौ पुत्र हुए, जिनमें से एक का नाम करुष था। करुष ने जिस भूभाग पर अपना आधिपत्य स्थापित किया और जहाँ एक नई संस्कृति की नींव रखी, उसे 'कारुष' कहा गया। इससे पूर्व इस क्षेत्र को 'गांगेय प्रदेश' (गंगा की गोद में बसा क्षेत्र) के नाम से जाना जाता था। प्राचीन कारुष प्रदेश के मध्य में आधुनिक बिहार के बक्सर, भोजपुर, रोहतास, कैमूर और उत्तर प्रदेश का गाजीपुर जिला शामिल था। इसकी सीमाओं को दक्षिण में कैमूर पर्वत समूह और पश्चिम में कर्मनाशा नदी सुरक्षित करती थी। यह क्षेत्र अपनी उर्वरता और सामरिक स्थिति के कारण 'देवों' और 'मानवों' के आकर्षण का केंद्र रहा। कर्मनाशा नदी है ।
कारुष प्रदेश का हृदय स्थल बक्सर (व्याघ्रसर) महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि 'सिद्धाश्रम' के रूप में विख्यात हुआ। यहाँ ऋषि संस्कृति ने अपने ज्ञान और विज्ञान को विकसित किया था । त्रेतायुग में यह क्षेत्र 'मलद और करुष' नामक दो जनपदों में विभक्त था, जहाँ ताड़का और सुबाहु जैसे राक्षसों का आतंक था। यह 'राक्षस संस्कृति' वस्तुतः उस विचारधारा का प्रतीक थी जो यज्ञों और ऋषि-ज्ञान में बाधा डालती थी। मर्यादा पुरुषोत्तम राम और लक्ष्मण का इस क्षेत्र में आगमन भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। अहिल्या उद्धार: गौतम आश्रम (अहिरौली) में राम ने पत्थर बन चुकी अहिल्या का उद्धार कर सामाजिक न्याय की स्थापना की। ताड़का वध: बक्सर की भूमि पर राम ने अधर्म की प्रतीक ताड़का का वध किया, जो असुर संस्कृति के अंत और आर्य संस्कृति के विजय का उद्घोष था।
सूर्यवंशी राजा हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व ने इस क्षेत्र को सैन्य शक्ति प्रदान की। उन्होंने कैमूर की दुर्गम पहाड़ियों पर रोहतासगढ़ किले का निर्माण कराया। यह किला आज भी प्राचीन इंजीनियरिंग का चमत्कार माना जाता है, जो सदियों तक अजेय रहा।
मध्यकाल के आगमन पर, धार के परमार राजा भोज ने इस क्षेत्र के मैदानी भागों को नई पहचान दी।भाषाई पहचान: राजा भोज के नाम पर इस क्षेत्र का नाम 'भोजपुर' पड़ा और यहाँ की बोली 'भोजपुरी' के रूप में विश्वविख्यात हुई।
स्थापत्य: बेलाउर का सूर्य मंदिर और अन्य धार्मिक संरचनाएं राजा भोज की सांस्कृतिक दूरदर्शिता के प्रमाण हैं।
कारुष प्रदेश की भूमि 'शक्ति' और 'शिव' के उपासकों का संगम रही है। यहाँ के प्रमुख धार्मिक स्थल न केवल आस्था के केंद्र हैं, बल्कि स्थापत्य कला के उत्कृष्ट नमूने भी हैं: ब्रह्मेश्वर नाथ (ब्रह्मपुर): बक्सर का यह मंदिर पौराणिक काल से 'पंचकोशी परिक्रमा' का मुख्य पड़ाव रहा है। गुप्ताधाम (रोहतास): कैमूर की कंदराओं में स्थित यह गुप्त महादेव का मंदिर चूना पत्थर की प्राकृतिक गुफाओं का अद्भुत उदाहरण है। माँ तुतला भवानी: रोहतास में जलप्रपात के मध्य स्थित यह शक्तिपीठ प्रकृति और धर्म के सुंदर समन्वय को दर्शाता है। मुंडेश्वरी मंदिर (भभुआ): इसे भारत का सबसे प्राचीन 'जीवित मंदिर' माना जाता है, जहाँ गुप्तकालीन कला के साक्ष्य आज भी मिलते हैं।
मुगलकाल में सासाराम शेरशाह सूरी की शक्ति का केंद्र बना। शेरशाह ने यहाँ से न केवल प्रशासनिक सुधार (जैसे लगान व्यवस्था) शुरू किए, बल्कि 'ग्रैंड ट्रंक रोड' के माध्यम से इस क्षेत्र को वैश्विक व्यापारिक मार्ग से जोड़ दिया।
कारुष प्रदेश की मिट्टी में पौरुष कूट-कूट कर भरा है। जगदीशपुर के बाबू कुंवर सिंह ने ८० वर्ष की आयु में आरा, बक्सर और सासाराम के क्रांतिकारियों को संगठित कर ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी। कैमूर की पहाड़ियाँ और नोखा-विक्रमगंज के मैदान क्रांतिकारियों के लिए गुरिल्ला युद्ध के अजेय क्षेत्र बन गए। बक्सर का उत्खनन से प्राप्त मौर्यकालीन और गुप्तकालीन टेराकोटा की मूर्तियाँ और मृदभांड (Pottery) यह सिद्ध करते हैं कि यहाँ की सभ्यता अत्यंत विकसित थी। कैमूर के शैलचित्र: की पहाड़ियों में स्थित प्रागैतिहासिक गुफा चित्र यह बताते हैं कि वैवस्वत मन्वंतर से भी पहले यहाँ मानव बसावट थी। रोहतासगढ़ की सुरंगें, सासाराम के अवशेष और बेलाउर जैसे प्राचीन मंदिरों को पुरातात्विक संरक्षण की नितांत आवश्यकता है। बिहार—जिसमें आरा, सासाराम, बक्सर और भभुआ जैसे जिले शामिल हैं—प्राचीन कारुष प्रदेश की विरासत को ही आगे बढ़ा रहा है।शिक्षा और साहित्य: विक्रमगंज, पिरो और नोखा जैसे नगर अब शिक्षा के बड़े केंद्र हैं। कृषि और उद्योग: सोन नदी की नहरों ने इस क्षेत्र को बिहार का 'अन्न भंडार' बना दिया है। कारुष प्रदेश का इतिहास यह सिखाता है कि भूगोल बदल सकता है, लेकिन संस्कृति की धारा निरंतर प्रवाहित होती रहती है। विश्वामित्र का ज्ञान, राम का मर्यादा-पथ, रोहिताश्व की दृढ़ता, राजा भोज की विद्वत्ता और कुंवर सिंह की वीरता—ये सभी तत्व मिलकर 'कारुष की आत्मा' का निर्माण करते हैं।संदर्भ सूची: श्रीमद्भागवत पुराण एवं वायु पुराण (कारुष वंश वर्णन) वाल्मीकि रामायण (बालकांड - विश्वामित्र आश्रम प्रसंग) भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) - बक्सर एवं रोहतास उत्खनन रिपोर्ट स्थानीय लोकगाथाएं एवं ऐतिहासिक अभिलेख (कुंवर सिंह गाथा) , शेरशाह सूरी और मध्यकालीन बिहार के प्रशासनिक दस्तावेज
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