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सोच का अंतर

सोच का अंतर

संजय जैन
मेरी सोच थोड़ी अलग है।
इसलिए मेरी दुनियां अलग है।
लोगों को चुभन मुझसे बहुत है
इसलिए लोगों से मेरी दूरियाँ है।।


कल तक जो मेरे साथ थे।
आज वो भी मुझसे दूर है।
क्योंकि मेरी कहनी करनी।
एक जैसी जो रहती है।।


कहकर बदलने वाले बहुत है।
जो गिरगिट जैसा रंग बदलते है।
जो अपनी सफलता के लिए ।
अपनों के ऊपर पैर रख देते है।।


आज कल के जमाने को देखो।
जो किसी का भी सगा नही है।
अवसर मिलते ही रंग दिखता है।
जो रिश्तों को भी भूल देता है।।


जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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