माँ बाप औलाद का फर्ज
संजय जैनऔलाद के सुख की खातिर
जीवन भर खुद को बेचा।
औलाद का भी क्या फर्ज
माँ-बाप के लिए बनता है।।
औलाद के सुख की खातिर ..।।
औलाद के लिए माँ-बाप ने
मनते माँगी मन्दिर मस्जिदो में।
दर-दर की ठोकरे खाकर भी
तुझे खूब पढ़ाया लिखाया।
की तू सुखी रहे जीवन में
तुझे इतनी काबिल बनाया।
मेरे दर्द की कोई छाया भी
तेरे सामने कभी न आये।।
औलाद के सुख की खातिर
जीवन भर खुद को बेचा..।।
माँ-बाप के सहारे होते है
उसकी औलादे ही जो।
अगर वो ही मुँह फेर ले तो
जीते जी वो मर जाते है।
फिर हाय जो निकलती है
उससे ढह जाते अच्छे-अच्छे।
महलो में रहने वाले भी
आ जाते है फिर सड़क पर।।
औलाद के सुख की खातिर
जीवन भर खुद को बेचा..।।
माँ बाप के बलिदानों का
कुछ तो तुम कर्ज उतारो।
औलाद होने का तुम भी
अपना कर्तव्य निभाओ।
जो तू सेवा कर पायेगा
तो जीवन में सफल होगा।
संसार में फिर अपना नाम
श्रवण कुमार जैसा कमायेगा।।
औलाद के सुख की खातिर
जीवन भर खुद को बेचा।
औलाद का भी क्या फर्ज
माँ-बाप के लिए बनता है।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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