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ऑंखों में समंदर

ऑंखों में समंदर

अरुण दिव्यांश
ऑंखों में समंदर है ,
दिल में तूफान बड़ा ।
पत्थर से करा जाऊॅं ,
दिल में अरमान बड़ा ।।
पत्थर को चूर कर दूॅं ,
अरियों को दूर कर दूॅं ।
फिर न देखे पीछे मुड़ ,
एसा मैं मजबूर कर दूॅं ।।
ऑंखों में समंदर है ,
उसे मैं शोला कर दूॅं ।
भस्म करे जला अरि ,
शोला ये गोला कर दूॅं ।।
कूद पडूॅं समंदर में फिर ,
शोला गोला बुझाने को ।
डूब्बी सहारे बाहर आऊॅं ,
सौहार्दता दिखाने को ।।
धधक रही लपट अभी ,
हमारे दिल के अंदर है ।
बुझाने हेतु पर्याप्त अभी ,
ऑंखों में ये समंदर है ।।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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