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"काल-शिल्प में अनुत्तरित आत्मप्रश्न"

"काल-शिल्प में अनुत्तरित आत्मप्रश्न"

समय—
प्रवाह मात्र? या मेरे भीतर
कोई अनाम, अनथक शिल्पकार?

एकांत की शिला पर—
यह अनसुनी टाँकी तेरा स्पर्श,
या चेतना का स्वयं को तराशना?

क्षण—
ओस-सा काँपता, होने–न होने के बीच;
नश्वरता की कोख में
क्या स्थायित्व का ही बीज है?

जब सब छूटता है—
संग, स्वर, संदर्भ;
रिक्तता—शून्य करती है, या पूर्ण?

तू तपाता है, तू ही धोता—
यह तेरा विधान,
या मेरे होने की अनिवार्य गाथा?

स्मृति—
धुँधलाती छाया, या समय की प्रतिछवि?
जो बीत गया—
क्या सचमुच विलीन,
या भीतर अब भी स्पंदित?

मौन—
रिक्तता का विस्तार, या अर्थ का उद्गम?
जहाँ शब्द चुकते हैं,
क्या वहीं से आरम्भ
स्वयं का अनकहा स्वरूप?

अंततः—
मैं कौन? क्षणों का अवशेष,
या उस अचल रेखा का बोध,
जो शेष रहकर भी निःशेष है?


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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