सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के महानायक: आदि शंकराचार्य
सत्येन्द्र कुमार पाठक
प्रकाश, जिसने अंधकार को दीप्ति में बदला इतिहास के कुछ कालखंड ऐसे होते हैं जब समाज अपनी जड़ों को भूलकर दिशाहीन हो जाता है। आठवीं शताब्दी का भारत वैचारिक उथल-पुथल का केंद्र था। बौद्ध धर्म की विकृतियों, खंडित सनातन मतों और आपसी वैमनस्य ने देश की आत्मा को क्षत-विक्षत कर दिया था। ऐसे समय में, जब भारत की भौगोलिक एकता संकट में थी, दक्षिण के एक छोटे से गाँव 'कालड़ी' से एक ऐसी महामेधा का उदय हुआ जिसने शस्त्र नहीं, बल्कि 'शास्त्र' के बल पर पूरे आर्यावर्त को एक सूत्र में पिरो दिया। आदि शंकराचार्य का 32 वर्षों का लघु जीवनकाल केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि भारत के पुनरुत्थान का घोषणापत्र है।
केरल की पूर्णा (पेरियार) नदी के तट पर बसा कालड़ी गाँव आज भी उस बालक शंकर की स्मृतियों को संजोए हुए है। शिवगुरु और आर्याम्बा की तपस्या के फलस्वरूप जन्मे शंकर ने शैशव में ही वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। पिता के असमय निधन ने उन्हें संसार की नश्वरता का बोध कराया। यहाँ वह प्रसंग अत्यंत प्रेरणादायी है जब मगरमच्छ ने बालक शंकर का पैर पकड़ लिया था। वह केवल एक चमत्कारिक घटना नहीं थी, बल्कि एक माँ के ममता भरे बंधनों से 'लोक-कल्याण' के मार्ग पर निकलने की व्याकुलता थी। माता से संन्यास की अनुमति लेकर, अपनी जड़ों को नमन कर, आठ वर्ष का वह बालक संपूर्ण भारत को अपना घर बनाने निकल पड़ा। उनका यह कदम सिद्ध करता है कि एक महान उद्देश्य के लिए व्यक्तिगत सुखों का त्याग अनिवार्य है।
ओंकारेश्वर: गुरु की खोज और अद्वैत का अंकुरण -नर्मदा की लहरों के बीच स्थित ओंकारेश्वर वह पावन भूमि है जहाँ शंकर को उनके गुरु गोविंद भगवत्पाद मिले। गुरु के प्रश्न "तुम कौन हो?" पर बालक शंकर का उत्तर—'निर्वाण षटकम'—मानवता के इतिहास का सबसे बड़ा दार्शनिक उद्घोष है। "न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद:..." (न मुझे मृत्यु का भय है, न जाति का भेद)। यहीं से 'अद्वैत' का वह बीज अंकुरित हुआ, जिसने आगे चलकर "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या" के सिद्धांत से विश्व को चमत्कृत किया। ओंकारेश्वर की वह गुफा आज भी ज्ञानपिपासुओं के लिए एक जीवंत प्रयोगशाला है। . बिहार की मेधा और महिषी का वह महा-शास्त्रार्थ एक इतिहासकार और साहित्यकार के नाते, मेरा मन सदैव बिहार की उस माटी के प्रति नतमस्तक रहता है जिसने आदि शंकर के ज्ञान को चुनौती दी और उसे पूर्णता प्रदान की। मगध की वैचारिक क्रांति और मिथिला की तर्क-परंपरा का मिलन आदि शंकर की यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है। सहरसा जिले का महिषी ग्राम उस ऐतिहासिक शास्त्रार्थ का साक्षी बना, जो मंडन मिश्र और शंकराचार्य के बीच हुआ। यह शास्त्रार्थ केवल दो विद्वानों की बहस नहीं थी, बल्कि 'कर्मकांड' और 'ज्ञानमार्ग' का समन्वय था। 17 दिनों तक चली वह चर्चा और निर्णायक के रूप में देवी भारती (मंडन मिश्र की पत्नी) का चयन, यह दर्शाता है कि प्राचीन बिहार में स्त्री-विदुषियों का सम्मान और ज्ञान का स्तर कितना ऊँचा था। जब देवी भारती ने कामशास्त्र पर प्रश्न पूछे, तो बाल-ब्रह्मचारी शंकर ने हार नहीं मानी। उन्होंने 'परकाया प्रवेश' के माध्यम से उस अनुभव को प्राप्त किया और सिद्ध किया कि सत्य का अन्वेषण करने वाले के लिए कोई भी क्षेत्र वर्जित नहीं है। अंततः मंडन मिश्र का 'सुरेश्वराचार्य' बनना और शृंगेरी पीठ का प्रथम आचार्य नियुक्त होना, बिहार की बौद्धिक विजय का प्रतीक है।
चतुष्कोण स्थापना: सांस्कृतिक अखंडता के चार प्रहरी शंकराचार्य ने अनुभव किया कि भारत की एकता को अक्षुण्ण रखने के लिए भौतिक सीमाओं के साथ-साथ आध्यात्मिक सीमाओं का निर्धारण आवश्यक है। उन्होंने भारत के चार कोनों में चार पीठों की स्थापना की: उत्तर में ज्योतिर्मठ (उत्तराखंड): जो हिमालय की अडिगता का प्रतीक है। दक्षिण में शृंगेरी (कर्नाटक): जहाँ ज्ञान की धारा अविराम बहती है। पूर्व में गोवर्धन पीठ (ओडिशा): जो जगन्नाथ की भक्ति और ज्ञान का केंद्र है। पश्चिम में शारदा पीठ (गुजरात): जो पश्चिम की सीमाओं का आध्यात्मिक रक्षक है। इन पीठों ने भारत को कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक ऐसा सांस्कृतिक कवच प्रदान किया, जिसके कारण सदियों के विदेशी आक्रमणों के बावजूद हमारी सनातन चेतना कभी लुप्त नहीं हुई। केदारनाथ: महाप्रयाण और अनंत में विलीनीकरण - अपनी दिग्विजय यात्रा पूर्ण कर, मात्र 32 वर्ष की आयु में आचार्य शंकर ने हिमालय की गोद में केदारनाथ को अपनी महासमाधि के लिए चुना। ओंकारेश्वर जहाँ 'प्रारंभ' था, केदारनाथ वहीं 'पूर्णता' है। 2013 की त्रासदी के बाद वहां पुनर्स्थापित उनकी भव्य प्रतिमा आज के आधुनिक भारत को यह संदेश दे रही है कि विनाश के बाद भी सत्य सदैव अ
आज जब हम आदि शंकर को याद करते हैं, तो एक टीस मन में उठती है। जिन चार पीठों को राष्ट्र के सांस्कृतिक और नैतिक उत्थान का नेतृत्व करना था, क्या वे आज अपनी उस मूल भूमिका का निर्वहन कर पा रहे हैं?
आज का युवा वैचारिक भ्रम में है। पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण और नैतिक मूल्यों के ह्रास के इस दौर में, इन पीठों को केवल अनुष्ठानों और मठों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। ज्ञान के आधुनिक केंद्र: इन मठों को 'वेदांत शोध केंद्रों' के रूप में विकसित होना होगा। सामाजिक सरोकार: जिस प्रकार शंकराचार्य ने समाज के हर वर्ग को साथ लिया, आज इन संस्थानों को पर्यावरण (जैसे नमामि गंगे), जल संरक्षण और सामाजिक समरसता के अभियानों का नेतृत्व करना होगा।
आदि शंकर के 'तर्क' को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर युवा पीढ़ी के सामने प्रस्तुत करना होगा।
"अहं ब्रह्मास्मि" का जीवंत बोधक आदि शंकराचार्य ने हमें सिखाया कि सत्य एक है, बस उसे देखने के नजरिए अलग हो सकते हैं। उनका 'अद्वैत' दर्शन आज के संघर्षरत विश्व के लिए 'वसुधैव कुटुंबकम्' का एकमात्र आधार है। बिहार की मेधा, दक्षिण का समर्पण और हिमालय की शांति का जो समन्वय उनके जीवन में दिखता है, वही भारत की असली पहचान है। महान संन्यासी के पदचिह्नों पर चलने का संकल्प लें, जिन्होंने अपनी पदयात्रा से भूमि को नहीं, बल्कि भारतीय मन को नापा था। जगतगुरु आदि शंकराचार्य को कोटि-कोटि नमन!आदि शंकराचार्य को कोटि-कोटि नमन!)
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