मेरे हृदय-वृत्त के बिंदु में, बस तुम्हारा नाम
कुमार महेंद्र
पाकर तुम्हारा साथ,
जीवन प्रसून-सा खिला।
सूनी दोपहरी की धूप में,
जैसे चुपके से सावन मिला।
पायल-स्वर से जले आशा-दीप,
जीवन हुआ उज्ज्वल ललाम।
मेरे हृदय-वृत्त के बिंदु में, बस तुम्हारा नाम।।
मेरा जीवन तो जैसे
धूप से फटा आकाश था।
रेत की चादर ओढ़े
मन का हर एक विश्वास था।
तुम आए तो फिर से जागा,
मधुर कलरव आठों याम।
मेरे हृदय-वृत्त के बिंदु में, बस तुम्हारा नाम।।
मेरे उर के कैनवास पर
तुमने अनूप चित्र उकेरा।
दिग्भ्रमित पगडंडियों को,
सपनों का पथ तुमने घेरा।
जब-जब विपदा-बदरी छाई,
तुम बने आशा-दीप अविराम।
मेरे हृदय-वृत्त के बिंदु में, बस तुम्हारा नाम।।
हर्ष-उत्साह की दिव्य तरंग,
अब जीवन की परिभाषा है।
मृदुल प्रणय-अनुबंधों में,
हर दिन नई अभिलाषा है।
हिय-कामनाएँ फलीभूत हों,
नयनों में स्वप्न अभिराम,
क्षण-क्षण में तुम ही तुम हो,
श्वास-श्वास तेरा ही धाम।
मेरे हृदय-वृत्त के बिंदु में, बस तुम्हारा नाम।।
✍️ कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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