संकल्प की मशाल
अरुण दिव्यांशएक हाथे संकल्प की मशाल ,
दूजे हाथ लिए धैर्य की ढाल ।
मस्तिष्क लिए समय का ध्वज ,
फिर देखो बुद्धि का कमाल ।।
मिलते हैं ये तन के अंदर चार ,
चारों आपस में हैं गहरे यार ।
चारों में एक भी गायब होता ,
सफलता में लगते वहीं दरार ।।
होते यदि चारों ही ये इकट्ठे ,
हम पहुॅंचते अंतरीक्ष के पार ।
चार में एक यदि हुए नदारद ,
शीघ्र ही हम मान जाते हार ।।
इनमें किसी से करना न बैर ,
अन्यथा मंजिल का नहीं खैर ।
वहीं के वहीं पड़े रह जाओगे ,
चाहे जितना भी कर लो सैर ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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