“रावण रथी, विरथ रघुवीरा?” - साधन नहीं, संकल्प ही असली शक्ति
- डॉ. राकेश दत्त मिश्र
भारतीय संस्कृति के महान ग्रंथ रामचरितमानस के लंका कांड में वर्णित एक अत्यंत प्रेरक प्रसंग आज भी हमारे जीवन, समाज और व्यवस्था पर उतना ही लागू होता है, जितना त्रेतायुग में था। धर्म और अधर्म के बीच अंतिम युद्ध चल रहा है। एक ओर लंका का सम्राट रावण अपने भव्य रथ, कवच, अस्त्र-शस्त्र और अपार सैन्यबल के साथ युद्धभूमि में खड़ा है, और दूसरी ओर भगवान श्रीराम बिना किसी रथ और बाहरी आडंबर के, शांत, संयत और आत्मविश्वास से भरे खड़े हैं।
यह दृश्य देखकर विभीषण का मन विचलित हो उठता है। वे चिंतित होकर श्रीराम से कहते हैं-“नाथ! रावण तो रथी है, सुसज्जित है, और आप विरथ हैं, बिना साधनों के। ऐसे में उसकी विजय कैसे संभव होगी?” यह प्रश्न केवल उस क्षण की चिंता नहीं था, बल्कि हर युग के मनुष्य का वही शाश्वत संदेह है, जो वह तब करता है जब उसके सामने साधनों से सम्पन्न शक्ति खड़ी होती है और वह स्वयं को संसाधनों के अभाव में कमजोर समझने लगता है।
श्रीराम इस प्रश्न पर मुस्कुराते हैं और जो उत्तर देते हैं,
“सुनहु सखा कह कृपानिधाना, जेहि जय होइ सो स्यंदन आना।
सौरज धीरज तेहि रथ चाका, सत्य शील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे, क्षमा कृपा समता रजु जोरे॥
ईस भजन सारथी सुजाना, बिरति चर्म संतोष कृपाना॥
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा, बर विज्ञान कठिन कोदंडा॥”
इस उत्तर में श्रीराम यह स्पष्ट कर देते हैं कि विजय का रथ कोई बाहरी साधन नहीं, बल्कि आंतरिक गुणों का समुच्चय है।
साहस और धैर्य उसके पहिए हैं, सत्य और चरित्र उसकी ध्वजा हैं, विवेक और परोपकार उसके घोड़े हैं, और करुणा व क्षमा उसकी लगाम हैं।
वह केवल युद्ध की रणनीति नहीं, बल्कि जीवन का गहन दर्शन है। वे कहते हैं कि विजय का रथ कोई बाहरी रथ नहीं होता, बल्कि वह हमारे भीतर के गुणों से निर्मित होता है-साहस और धैर्य उसके पहिए हैं, सत्य और चरित्र उसकी ध्वजा हैं, विवेक, संयम और परोपकार उसके घोड़े हैं, और क्षमा, करुणा तथा समता उसकी लगाम हैं। ईश्वर की भक्ति उसका सारथी है, वैराग्य उसकी ढाल है और संतोष उसकी तलवार। अर्थात, जो इन गुणों से युक्त है, वही सच्चे अर्थों में “रथी” है, चाहे उसके पास बाहरी साधन हों या न हों।
यह प्रसंग केवल कथा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आज के समाज और राजनीति में भी उतनी ही तीव्रता से दिखाई देता है। आज जब हम किसी ईमानदार, संवेदनशील और समाज के प्रति समर्पित व्यक्ति से कहते हैं कि वह चुनाव में उतरकर समाज को बदलने का प्रयास करे, तो अक्सर वही उत्तर मिलता है-“हम साधन-विहीन हैं, हमारे पास धन नहीं है, संसाधन नहीं हैं, हम कैसे चुनाव लड़ेंगे?” यह आधुनिक युग का वही विभीषण-प्रश्न है-“रावण रथी, और हम विरथ…”
लेकिन यदि हम श्रीराम के उत्तर को समझ लें, तो यह भ्रम स्वयं टूट जाता है। सच्चाई यह है कि समाज परिवर्तन का कार्य केवल धन और साधनों से नहीं होता, बल्कि संकल्प, निष्ठा और जनविश्वास से होता है। इतिहास और वर्तमान दोनों इस बात के साक्षी हैं कि अपार संसाधनों से युक्त लोग हमेशा समाज को सही दिशा नहीं दे पाए, जबकि सीमित साधनों वाले कई व्यक्तियों ने अपने साहस, सत्य और सेवा-भाव से समाज में गहरा परिवर्तन लाया है।
रावण के पास सब कुछ था-धन, शक्ति, विद्या-लेकिन उसके भीतर अहंकार और अधर्म था, और यही उसकी पराजय का कारण बना। वहीं श्रीराम के पास बाहरी वैभव भले न हो, लेकिन उनके भीतर सत्य, धर्म और मर्यादा की अटूट शक्ति थी, और अंततः विजय उसी की हुई। यह प्रसंग स्पष्ट कर देता है कि असली युद्ध बाहरी साधनों का नहीं, बल्कि आंतरिक मूल्यों का होता है।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हम अपने पास साधनों की कमी को गिनें, बल्कि इस बात की है कि हम अपने भीतर के गुणों को पहचानें और उन्हें सशक्त बनाएं। यदि किसी व्यक्ति के भीतर साहस है, धैर्य है, सत्य के प्रति निष्ठा है और समाज के लिए कुछ करने का संकल्प है, तो वह कभी भी “विरथ” नहीं हो सकता। उसका चरित्र ही उसका रथ है और जनता का विश्वास उसकी सबसे बड़ी शक्ति।
अंततः, यह प्रसंग हमें एक सरल लेकिन गहरा संदेश देता है-विजय का आधार साधन नहीं, संकल्प है। यदि संकल्प अडिग हो और मार्ग सत्य का हो, तो कोई भी रावण-चाहे वह सत्ता का अहंकार हो, धन का दंभ हो या परिस्थितियों की कठिनाई-हमारी राह नहीं रोक सकता।इसलिए जब भी जीवन या समाज के क्षेत्र में यह प्रश्न उठे कि “हम साधन-विहीन हैं, हम क्या कर सकते हैं?”, तब हमें यह स्मरण करना चाहिए कि श्रीराम ने स्वयं बिना रथ के भी विजय प्राप्त की थी, क्योंकि उनका वास्तविक रथ उनके भीतर था। और यही सत्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है—विजय का रथ बाहर नहीं, भीतर बनता है; और जहाँ संकल्प सशक्त होता है, वहाँ साधनों की कमी भी हार नहीं बन पाती।
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