क्षिप्रा के तट पर अध्यात्म और संस्कृति की महायात्रा: उज्जैन
: सत्येन्द्र कुमार पाठक
काल की नगरी में एक साहित्यिक तीर्थ का इतिहास जब भूगोल के साथ एकाकार हो जाता है, तो वह स्थान 'तीर्थ' बन जाता है। भारत की सांस्कृतिक धुरी पर स्थित उज्जैन, जिसे हम अवंतिका और महाकाल की नगरी के रूप में जानते हैं, मेरी इस बार की यात्रा का केंद्र था। १६ अप्रैल से १८ अप्रैल २०२६ तक का मेरा उज्जैन प्रवास केवल भौतिक यात्रा नहीं थी, बल्कि यह काल के प्रवाह में पीछे जाकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों को फिर से जीवित करने का एक प्रयास था। एक इतिहासकार और लेखक के रूप में, मैंने हमेशा उन स्थानों की खोज की है जहाँ इतिहास सांस लेता है, और उज्जैन तो स्वयं इतिहास की जीवंत पुस्तक है। मौन तीर्थ आश्रम में शब्द मौन होकर मुखर होते हैं । उज्जैन के गंगाघाट के समीप स्थित 'मौन तीर्थ आश्रम' की महिमा को शब्दों में बांधना कठिन है। शिप्रा नदी यहाँ उत्तर की ओर बहती है, जो इसे आध्यात्मिक दृष्टि से गंगा के समान ही पवित्र बनाता है। आश्रम के १० एकड़ के विस्तृत परिसर में प्रवेश करते ही एक अलौकिक शांति का अनुभव होता है। यहाँ की व्यवस्था और यहाँ का वातावरण, ब्रह्मलीन मौनी बाबा की तपस्या और वर्तमान में महामंडलेश्वर स्वामी डॉ. सुमनानंद गिरि जी के कुशल मार्गदर्शन का परिणाम है। आश्रम में वेदों की ध्वनि, मोर की चहचहाहट और शिप्रा के कल-कल करते जल की गूंज एक ऐसा नाद उत्पन्न करती है जो मन के विकारों को हर लेने में सक्षम है। आश्रम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक 'वैचारिक केंद्र' है। यहाँ वेद अध्ययन, संन्यास दीक्षा, और सामाजिक उत्थान के कार्य एक साथ चलते हैं। विशेष रूप से, 'वाग्देवी सम्मान' जैसे आयोजनों के माध्यम से यह धाम साहित्य और कला को जो प्रोत्साहन दे रहा है, वह सराहनीय है।
हृदयस्पर्शी सम्मान: यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव वह क्षण था जब मौन तीर्थ पीठ के तत्वावधान में मेरा सम्मान समारोह आयोजित किया गया। महामंडलेश्वर स्वामी डॉ. सुमनानंद गिरि जी का सान्निध्य मिलना ही मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि थी। जब मुझे अति प्राचीन तांत्रिक लिंग—भगवान गंगाधर सदाशिव का स्मृति चिह्न भेंट किया गया, तो मुझे लगा कि मैं केवल एक भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि उज्जैन की सदियों पुरानी ऊर्जा को ग्रहण कर रहा हूँ। मंच पर 'सत्संग सुमन', 'मानस सुमन' अभिनंदन ग्रंथ और 'मानस अर्चन' पत्रिका के साथ मुझे अलंकृत किया गया। 'मानस अर्चन' के संपादक हिमांशु कौशिक और प्रबंध संपादक समीक्षा शर्मा के विचारोत्तेजक शब्द इस यात्रा की साहित्यिक गहराई को बढ़ाने वाले थे। एक शिक्षक और इतिहासकार के रूप में, इस सम्मान ने मेरे उन ४० वर्षों के समर्पण को और भी अर्थपूर्ण बना दिया, जो मैंने समाज और संस्कृति की सेवा में व्यतीत किए हैं।
मौन तीर्थ धाम के बारे में शोध करते हुए मैंने पाया कि यह स्थान किंवदंतियों और इतिहास का अद्भुत मिश्रण है। यहाँ का शालीग्राम पत्थर कोई साधारण पत्थर नहीं है; लोक मान्यता है कि स्वयं गोस्वामी तुलसीदास जी ने उसकी अर्चना की थी। जब आप उस पत्थर के सामने खड़े होते हैं, तो आपको तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस की चौपाइयाँ जैसे सुनाई देने लगती हैं। नवग्रह मंदिर और वहाँ की भव्य यज्ञशाला यह सिद्ध करती है कि हमारे पूर्वज ज्योतिष और विज्ञान में कितने उन्नत थे। आज के तनावपूर्ण युग में, जहाँ मनुष्य शांति की तलाश में भटक रहा है, मौन तीर्थ आश्रम का यह परिसर साधना, ध्यान और आध्यात्मिक चिंतन के लिए एक सर्वश्रेष्ठ केंद्र के रूप में उभरा है। उज्जैन के अन्य पौराणिक स्थलों का दर्शन हमारी यात्रा की टोली में डॉ. ऊषा किरण श्रीवास्तव, डॉ. संगीता सागर, अजय कुमार और कुमुद कुमारी जैसे प्रबुद्ध साथी थे। हम सभी ने उज्जैन के प्रमुख स्थलों की एक दिव्य परिक्रमा की: महाकाल ज्योतिर्लिंग: महाकाल का दर्शन करना ऐसा है जैसे समय के स्वामी के समक्ष अपना अस्तित्व समर्पित करना। भस्म आरती के दौरान जो दिव्य ऊर्जा महसूस होती है, उसे शब्दों में पिरोना असंभव है। हरसिद्धि , मंगलदेव, संदीपनी मुनि आश्रम और गढ़कालिका: सम्राट विक्रमादित्य की धर्मपरायणता और महाकवि कालिदास की रचनात्मकता इसी भूमि से उपजी थी। माँ गढ़कालिका के मंदिर में खड़े होकर मुझे कालिदास के मेघदूत की उन पंक्तियों का स्मरण हो आया जहाँ उन्होंने इस नगरी के वैभव का वर्णन किया है। भर्तृहरि गुफा: राजा से सन्यासी बनने की यात्रा को परिभाषित करती यह गुफा, वैराग्य का प्रतीक है। इतिहासकार के नाते, यह स्थान मुझे यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि सत्ता का त्याग कितना कठिन और गौरवशाली होता है। काल भैरव और चिंतामणि गणेश: इन देवों के दर्शन ने यात्रा को पूर्णता प्रदान की।।नया दृष्टिक यात्रा के दौरान हमने देखा कि किस प्रकार आज की युवा पीढ़ी अध्यात्म की ओर आकर्षित हो रही है। सोशल मीडिया पर सक्रिय हर्षा रिछारिया का संन्यास लेकर 'हर्षानंद गिरी' बनना इस बात का प्रमाण है कि भारत की प्राचीन परंपराएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। जब एक युवा पीढ़ी 'लव जिहाद' जैसी कुरीतियों से पीड़ितों की सहायता करने का संकल्प लेती है, तो यह स्पष्ट होता है कि मौन तीर्थ जैसे आश्रम केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि समाज सुधार का कार्य भी कर रहे हैं।
स्मृतियों का संचय में १८ अप्रैल को जब हम उज्जैन से वापस लौट रहे थे, तो मेरी डायरी में केवल तारीखें नहीं, बल्कि अनुभव के अनगिनत पन्ने दर्ज हो चुके थे। मैंने महसूस किया कि सत्येन्द्र कुमार पाठक के रूप में मेरी पहचान तब तक अधूरी है जब तक मैं भारत की इन जीवंत धरोहरों को अपनी लेखनी के माध्यम से जन-जन तक न पहुँचाऊँ। उज्जैन की इस यात्रा ने मुझे सिखाया कि 'मौन' का अर्थ 'बोलना बंद करना' नहीं, बल्कि 'स्वयं को सुनना' है। शिप्रा के तट पर मैंने जो शांति प्राप्त की, वह मेरे आगामी साहित्य लेखन, विशेष रूप से 'निर्माण भारती' और अन्य ऐतिहासिक शोधों में प्रेरणा का स्रोत बनेगी। , यह संस्मरण मात्र उन तीन दिनों की घटनाओं का ब्यौरा नहीं है, बल्कि उस सनातन चेतना की वंदना है जो उज्जैन के कण-कण में विद्यमान है। मौन तीर्थ पीठ की स्मृतियाँ हमेशा मेरे मन के किसी कोने में एक दीप की तरह जलती रहेंगी, जो समय-समय पर मुझे अपनी जड़ों से जुड़ने का मार्ग दिखाएंगी।
"अवन्तिका पुरीं रम्यां, क्षिप्रा तट विहारिणीम्।
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