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विंध्य पर्वतमाला संस्कृति

विंध्य पर्वतमाला संस्कृति

सत्येन्द्र कुमार पाठक
राष्ट्र की सांस्कृतिक धुरी भारत के मानचित्र पर विंध्य पर्वतमाला केवल एक भौगोलिक विभाजक रेखा नहीं है, बल्कि यह आर्यावर्त और दक्षिणापथ को जोड़ने वाला एक जीवित सेतु है। हिमालय जहाँ भारत का मुकुट है, वहीं विंध्य भारत का हृदय है। भू-वैज्ञानिक दृष्टि से यह पर्वत शृंखला हिमालय से भी प्राचीन है, जिसका अस्तित्व 'प्री-कैम्ब्रियन' काल की चट्टानों में अंकित है। पुराणों से लेकर आधुनिक इतिहास तक, विंध्य की कंदराओं ने ऋषियों के मंत्र, राजाओं के शौर्य और विविध संप्रदायों की प्रार्थनाओं को प्रतिध्वनित किया है।
विंध्य की उत्पत्ति और उसके विस्तार की कथा भारतीय वांग्मय में अहंकार के दमन और गुरु-शिष्य परंपरा का अनुपम उदाहरण है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब विंध्य पर्वत ने सूर्य का मार्ग रोकने हेतु अपना कद बढ़ाना प्रारंभ किया, तब सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा। देवताओं के आग्रह पर महर्षि अगस्त्य दक्षिण की ओर प्रस्थान किए। विंध्य ने अपने गुरु को देखते ही विनयपूर्वक झुककर प्रणाम किया। अगस्त्य ऋषि ने उसे आदेश दिया, "जब तक मैं दक्षिण से वापस न आऊँ, तुम इसी स्थिति में झुके रहना।" ऋषि कभी वापस नहीं लौटे और विंध्य आज भी उसी 'विनय' की मुद्रा में खड़ा है। यह कथा उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक समन्वय और भाषाई सेतु के निर्माण का प्रतीक है
विंध्य का विस्तार पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में बिहार और झारखंड तक फैला है। इसके विभिन्न पर्वत समूह अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं: कैमूर श्रेणी: यह विंध्य का पूर्वी विस्तार है जो मध्य प्रदेश से उत्तर प्रदेश के सोनभद्र होते हुए बिहार के रोहतास और कैमूर तक जाता है। यहाँ की गुफाओं में प्रागैतिहासिक काल के शैलचित्र (Rock Paintings) मानव सभ्यता के आदिम साक्ष्य हैं।भांडेर श्रेणी: विंध्य का मध्यवर्ती भाग, जो बुंदेलखंड के पठार का आधार निर्मित करता है। बिहार के पर्वत समूह: गया की ब्रह्मयोनि पहाड़ी, जहाँ बुद्ध ने उपदेश दिया; बराबर की पहाड़ियाँ, जहाँ मौर्यकालीन शिल्पकला के दर्शन होते हैं; और बांका का मंदार पर्वत, जिसे समुद्र मंथन की मथानी माना जाता है।
राजगीर और पारसनाथ: मगध की पंच-पहाड़ियाँ और झारखंड का सम्मेद शिखर (पारसनाथ), जो विंध्य और छोटानागपुर पठार की संधि पर स्थित हैं।
. नदी संस्कृति: जल-विभाजक और जीवनदायिनी धाराएँ विंध्य पर्वतमाला भारत की नदियों का 'मातृ-गर्भ' है। यहाँ की नदियाँ न केवल जल का स्रोत हैं, बल्कि वे एक विशिष्ट 'नदी संस्कृति' का निर्माण करती हैं:
नर्मदा और सोन का विरह: अमरकंटक से निकलने वाली नर्मदा (रेवा) पश्चिम की ओर और सोन उत्तर-पूर्व की ओर बहती है। नर्मदा को विंध्य की पुत्री और भारत की सबसे पवित्र नदियों में गिना जाता है।
बिहार-झारखंड की नदियाँ: पुनपुन, निलांजन (फल्गु), मोहने, मोरहर, बताने और कर्मनाशा। ये नदियाँ दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवाहित होकर गंगा की उर्वरता बढ़ाती हैं। नेपाल समूह का मिलन: उत्तर से आने वाली बागमती, गंडक और कोशी जब गंगा के मैदान में विंध्य से आने वाली नदियों के सामने पहुँचती हैं, तो यह क्षेत्र 'नदी संस्कृति' का विश्व समागम स्थल बन जाता है। विंध्य की नदियाँ वर्षा आधारित हैं और यहाँ के पठारी जल को गंगा के मैदानों तक पहुँचाकर कृषि प्रधान समाज (मनु संस्कृति) का आधार तैयार करती हैं।
ऋषि संस्कृति और राजाओं की तपोभूमि
विंध्य की कंदराएँ युगों-युगों से ऋषियों और तपस्वियों का आश्रय रही हैं: ऋषि परंपरा: चित्रकूट के वनों में महर्षि अत्रि और माता अनसूया का निवास, विंध्याचल में मार्कण्डेय ऋषि की तपस्या और दंडकारण्य के द्वार पर अगस्त्य का आश्रम। इन ऋषियों ने विंध्य को 'ज्ञान की घाटी' बना दिया। मनु और इक्ष्वाकु वंश: राजा मनु द्वारा स्थापित मर्यादाओं का पालन विंध्य के क्षेत्रों में विशेष रूप से देखा गया। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने अपने वनवास के 14 वर्षों में से लगभग 11 वर्ष विंध्य की श्रेणियों (चित्रकूट) में व्यतीत किए। राजवंश: चंदेलों, कलचुरियों और बुंदेलों ने विंध्य की अभेद्य पहाड़ियों पर कलिंजर और अजयगढ़ जैसे दुर्गों का निर्माण किया।
मानवेतर योनियाँ: देव, असुर और खग संस्कृति में विंध्य के सघन वन और दुर्गम गुफाएँ केवल मनुष्यों की ही नहीं, बल्कि विभिन्न योनियों की भी क्रीड़ा-स्थली रही हैं: देव और असुर: पौराणिक काल में मधु-कैटभ और शुंभ-निशुंभ जैसे असुरों के विनाश हेतु माँ दुर्गा ने इसी पर्वत पर 'विंध्यवासिनी' के रूप में अवतार लिया। नाग, गंधर्व और अप्सरा: विंध्य के पातालकोट और सतपुड़ा के संधि स्थलों को नागलोक का प्रवेश द्वार माना गया है। मेघदूत में कालिदास ने यहाँ के गंधर्वों और यक्षों का सुंदर वर्णन किया है। खग (पक्षी) संस्कृति: रामायण का प्रसिद्ध प्रसंग जहाँ जटायु और सम्पाती (गिद्धराज) का निवास विंध्य की चोटियों पर बताया गया है, वह यहाँ की जैव-विविधता और प्रकृति के प्रति सम्मान को दर्शाता है।
सौर से सिख पंथ तक विंध्य पर्वतमाला विश्व के धार्मिक इतिहास का सबसे बड़ा 'कोलाज' है: सनातन धर्म: यहाँ शाक्त (विंध्यवासिनी, मैहर की शारदा), शैव (अमरकंटक, ओंकारेश्वर), और वैष्णव (चित्रकूट के राम) मतों का त्रिकोण है। सौर और ब्रह्म पूजा के अवशेष यहाँ के प्राचीन सूर्य मंदिरों में मिलते हैं। जैन और बौद्ध: राजगीर की पहाड़ियाँ और सांची के स्तूप विंध्य के आँगन में ही बुद्ध की करुणा और तीर्थंकरों के त्याग की गाथा गाते हैं। वैश्विक पंथ: प्राचीन व्यापारिक मार्गों (दक्षिणापथ) के कारण यहाँ यवन (यूनानी), यहूदी और पारसी व्यापारियों का आगमन हुआ। मध्यकाल में इस्लाम की सूफी परंपरा और मांडू की वास्तुकला ने इसे नया आयाम दिया। ईसाई और सिख: विंध्य के आधुनिक शहरों में ईसाई मिशनरियों की शिक्षा और सिख गुरुओं (गुरु नानक देव और गुरु गोविंद सिंह) की यात्राओं ने यहाँ की सामाजिक समरसता को और भी प्रगाढ़ किया।
विंध्य केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी संपन्न है: खनिज और ऊर्जा: यहाँ पन्ना की हीरा खदानें और कोयले के विशाल भंडार हैं। जनजातीय समाज: गोंड, कोल और बैगा जनजातियों ने 'पर्वत संस्कृति' को जीवित रखा है। उनकी जड़ी-बूटी चिकित्सा और प्रकृति के साथ तालमेल का विज्ञान आज के आधुनिक युग के लिए शोध का विषय है। वास्तुकला: विंध्य के लाल बलुआ पत्थर ने ही भारत के गौरवशाली स्मारकों (लाल किला, मौर्य स्तंभ) को रूप दिया है। विंध्य पर्वतमाला भारत की वह आत्मा है जो हिमालय की ऊंचाइयों को दक्षिण के महासागर से जोड़ती है। नेपाल की चोटियों से लेकर थाईलैंड के 'खमेर' मंदिरों तक जो सांस्कृतिक प्रभाव दिखता है, उसका मूल विंध्य की 'ऋषि और पर्वत संस्कृति' में समाहित है। यह पर्वत शृंखला सिखाती है कि विविधता ही भारत की शक्ति है। विंध्य आज भी अपनी कंदराओं में उन रहस्यों को संजोए हुए है, जो मानव को प्रकृति से, व्यक्ति को समाज से और आत्मा को परमात्मा से जोड़ते हैं। इसकी रक्षा करना और इसके इतिहास को सहेजना, आधुनिक मनु-संस्कृति का परम कर्तव्य है।


संदर्भ: मार्कण्डेय पुराण (विंध्य महात्म्य) , वाल्मीकि रामायण (अयोध्या और अरण्य कांड) , भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (विंध्यन सुपरग्रुप रिपोर्ट) , बौद्ध एवं जैन ग्रंथ (राजगीर और वैशाली खंड) , नर्मदा पुराण एवं क्षेत्रीय लोक-साहित्य
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