स्वार्थ और सौदेबाजी की दुनिया में भारत की नैतिक कूटनीति कितना काम आयेगी
सुधीर तालियानभारत आज बदलती वैश्विक राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। ब्रिक्स सम्मेलन में सीमित सफलता, रूस-चीन की बढ़ती नजदीकियां, ईरान के साथ कमजोर होते संबंध और अमेरिका की अनिश्चित नीतियों के बीच भारत के सामने नई रणनीतिक चुनौतियाँ उभर रही हैं। ऐसे समय में आगामी क्वाड सम्मेलन 2026 भारत के लिए एक बड़ा अवसर बन सकता है। यह लेख बताता है कि कैसे भारत क्वाड के माध्यम से इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है, सप्लाई चेन सुरक्षा बढ़ा सकता है और दक्षिण एशिया में अपने प्रभाव को पुनर्स्थापित कर सकता है। बदलती जियोपॉलिटिक्स में अब नैतिकता नहीं बल्कि रणनीतिक सौदेबाजी ही वैश्विक राजनीति की वास्तविक शक्ति बन चुकी है, और भारत को भी इसी वास्तविकता के अनुसार अपनी विदेश नीति को मजबूत करना होगा।
क्वाड में भारत की निर्णायक भूमिका: बदलती विश्व व्यवस्था में नई कूटनीतिक दिशा
21वीं सदी की वैश्विक राजनीति अब केवल आदर्शवाद, लोकतंत्र या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सिद्धांतों पर नहीं चल रही। वर्तमान समय की जियोपॉलिटिक्स पूर्णतः शक्ति, आर्थिक हितों और रणनीतिक सौदेबाजी पर आधारित हो चुकी है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ता तनाव, चीन-अमेरिका प्रतिद्वंद्विता, सप्लाई चेन संकट और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब कोई भी देश केवल नैतिकता के आधार पर विश्व राजनीति में अपनी स्थिति सुरक्षित नहीं रख सकता। भारत भी इस नए वैश्विक परिवेश के बीच स्वयं को पुनर्परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है।
हाल के वर्षों में भारत ने वैश्विक मंचों पर अपनी सक्रियता बढ़ाई है। जी-20 की अध्यक्षता से लेकर ब्रिक्स और क्वाड जैसे समूहों में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने तक भारत ने यह संकेत दिया है कि वह केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं बल्कि एक वैश्विक निर्णायक शक्ति बनना चाहता है। लेकिन यदि हाल ही में दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन का मूल्यांकन किया जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत को अपेक्षित रणनीतिक सफलता नहीं मिली।
ब्रिक्स सम्मेलन में न तो वैश्विक सप्लाई चेन पर कोई ठोस समाधान सामने आया, न ही सदस्य देशों के बीच आर्थिक समन्वय की ऐसी व्यवस्था बनी जो पश्चिमी वित्तीय संस्थाओं के विकल्प के रूप में प्रभावी दिखाई दे। लंबे समय से चर्चा में रहा ब्रिक्स बैंक भी अपनी राजनीतिक सीमाओं और सदस्य देशों के अंतर्विरोधों के कारण अपेक्षित प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पाया। इसके अतिरिक्त चीन का प्रभाव इस मंच पर लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है, जिससे भारत की रणनीतिक चिंताएँ और गहरी हुई हैं।
ब्रिक्स की सीमाएँ और भारत की चिंता
ब्रिक्स की मूल अवधारणा पश्चिमी वर्चस्व को संतुलित करने की थी। ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका को एक ऐसे समूह के रूप में देखा गया था जो वैश्विक दक्षिण की आवाज बन सके। परंतु वास्तविकता यह है कि यह समूह आंतरिक असमानताओं और अलग-अलग रणनीतिक हितों से घिरा हुआ है।
चीन इस मंच को अपने आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रभाव विस्तार के साधन के रूप में उपयोग कर रहा है। रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण चीन पर अत्यधिक निर्भर हो चुका है। परिणामस्वरूप ब्रिक्स में रूस का झुकाव अब स्पष्ट रूप से चीन की ओर दिखाई देता है। यह स्थिति भारत के लिए चिंताजनक है क्योंकि रूस लंबे समय तक भारत का सबसे विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार रहा है।
भारत और ईरान के संबंधों में भी पिछले कुछ वर्षों में अपेक्षित गर्मजोशी नहीं दिखाई दी। चाबहार परियोजना जैसी रणनीतिक योजनाओं के बावजूद भारत पश्चिम एशिया में अपनी स्थिति को उस स्तर तक मजबूत नहीं कर पाया जिसकी आवश्यकता थी। अमेरिका के प्रतिबंधों और बदलते पश्चिम एशियाई समीकरणों ने भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को सीमित किया।
इन परिस्थितियों में भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि वह अपनी विदेश नीति को किस दिशा में ले जाए। क्या भारत केवल संतुलनकारी शक्ति बना रहेगा या वह स्वयं क्षेत्रीय शक्ति संरचना को प्रभावित करने वाला निर्णायक केंद्र बन सकेगा?
क्वाड: भारत के लिए नया अवसर
इसी संदर्भ में आगामी 26 मई 2026 को दिल्ली में होने वाला क्वाड सम्मेलन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
क्वाड यानी भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का समूह मूलतः इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में सामरिक संतुलन बनाए रखने के लिए गठित हुआ था। प्रारंभिक वर्षों में इसे केवल सुरक्षा सहयोग मंच माना जाता था, लेकिन अब इसका दायरा आर्थिक सहयोग, तकनीकी साझेदारी, सप्लाई चेन सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और समुद्री रणनीति तक फैल चुका है।
भारत के लिए यह सम्मेलन केवल एक कूटनीतिक आयोजन नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक अवसर है। यदि भारत सही रणनीति अपनाता है तो वह इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में अपनी निर्णायक भूमिका स्थापित कर सकता है।
अमेरिका की बदलती राजनीति और भारत की रणनीति
अमेरिका आज भी विश्व की सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक शक्ति है, लेकिन उसकी वैश्विक विश्वसनीयता पहले जैसी नहीं रही। डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति ने अमेरिकी विदेश नीति को अत्यधिक अनिश्चित बना दिया है। ट्रंप का दृष्टिकोण पारंपरिक रणनीतिक साझेदारियों से अधिक सौदेबाजी पर आधारित है।
यही कारण है कि आज जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कई देश अमेरिका की दीर्घकालिक प्रतिबद्धताओं को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।
हाल ही में चीन के साथ अमेरिका की बातचीत और ताइवान नीति में दिखाई दिए संकेतों ने जापान को विशेष रूप से चिंतित किया है। जापान समझता है कि यदि अमेरिका अपने रणनीतिक हितों के लिए अचानक नीति बदल सकता है तो भविष्य में वह एशियाई सहयोगियों के हितों को भी समझौते का विषय बना सकता है।
ऑस्ट्रेलिया भी चीन के साथ अपने आर्थिक संबंधों और अमेरिका पर सुरक्षा निर्भरता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में भारत क्वाड के भीतर सबसे स्थिर, स्वतंत्र और संतुलित शक्ति के रूप में उभर सकता है।
भारत को अमेरिका के साथ संबंधों में भावनात्मक या वैचारिक दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए। वर्तमान वैश्विक राजनीति में स्थायी मित्र नहीं बल्कि स्थायी हित महत्वपूर्ण होते हैं। यदि अमेरिका चीन को संतुलित करने के लिए भारत पर निर्भर है तो भारत को भी अपनी शर्तों पर रणनीतिक सहयोग विकसित करना चाहिए।
सप्लाई चेन और आर्थिक सुरक्षा
कोविड महामारी और चीन पर अत्यधिक निर्भर वैश्विक उत्पादन व्यवस्था ने यह स्पष्ट कर दिया कि सप्लाई चेन केवल आर्थिक विषय नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बन चुकी है।
भारत के पास यह अवसर है कि वह क्वाड के माध्यम से वैकल्पिक सप्लाई चेन नेटवर्क का केंद्र बने। सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, दवाइयाँ, रेयर अर्थ मिनरल्स और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में भारत अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है।
इसके लिए भारत को केवल विदेशी निवेश आकर्षित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे घरेलू औद्योगिक क्षमता, तकनीकी अनुसंधान और इंफ्रास्ट्रक्चर को भी तेज गति से विकसित करना होगा।
यदि क्वाड देशों के बीच उत्पादन और तकनीकी सहयोग की स्थायी व्यवस्था बनती है तो भारत एशिया में चीन के विकल्प के रूप में उभर सकता है। यह भारत की आर्थिक सुरक्षा और रोजगार दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।
दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका
भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती केवल चीन नहीं बल्कि दक्षिण एशिया में अपनी प्रभावशीलता बनाए रखना भी है।
पिछले वर्षों में चीन ने नेपाल, श्रीलंका, मालदीव और बांग्लादेश में अपने आर्थिक प्रभाव का विस्तार किया है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के माध्यम से चीन दक्षिण एशिया में दीर्घकालिक रणनीतिक उपस्थिति बनाने की कोशिश कर रहा है।
भारत को क्वाड के माध्यम से यह सुनिश्चित करना होगा कि दक्षिण एशिया में उसकी सुरक्षा और आर्थिक चिंताओं को प्राथमिकता मिले। यदि अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया वास्तव में भारत को इंडो-पेसिफिक का केंद्रीय स्तंभ मानते हैं तो उन्हें दक्षिण एशिया में भारत की रणनीतिक संवेदनशीलताओं को स्वीकार करना होगा।
भारत को अपनी पड़ोसी नीति में भी बदलाव लाने की आवश्यकता है। केवल सुरक्षा दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं होगा। क्षेत्रीय व्यापार, ऊर्जा सहयोग, डिजिटल कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के माध्यम से भारत को दक्षिण एशिया में भरोसेमंद साझेदार बनना होगा।
चीन के साथ संतुलन की आवश्यकता
भारत और चीन के संबंध आने वाले दशकों में एशियाई राजनीति की दिशा तय करेंगे।
भारत को चीन के प्रति न तो अत्यधिक आक्रामक और न ही अत्यधिक नरम नीति अपनानी चाहिए। वास्तविकता यह है कि चीन आर्थिक, तकनीकी और सैन्य दृष्टि से अत्यंत शक्तिशाली देश बन चुका है। सीधे टकराव की नीति भारत के हित में नहीं होगी।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि भारत चीन के विस्तारवाद को स्वीकार कर ले।
भारत को बहुपक्षीय रणनीति अपनानी होगी—एक ओर सीमाई सुरक्षा मजबूत करनी होगी, दूसरी ओर आर्थिक प्रतिस्पर्धा बढ़ानी होगी और साथ ही वैश्विक मंचों पर चीन के प्रभाव को संतुलित करने के लिए साझेदारियों को मजबूत करना होगा।
क्वाड इसी संतुलन का महत्वपूर्ण साधन बन सकता है।
पश्चिम एशिया और भविष्य का संकट
विश्व राजनीति का सबसे अस्थिर क्षेत्र आज पश्चिम एशिया है। ईरान, इज़राइल, अमेरिका और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच संघर्ष की संभावनाएँ लगातार बनी हुई हैं।
भारत के लिए यह केवल दूरस्थ भू-राजनीतिक संकट नहीं है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक मार्ग और करोड़ों भारतीयों के आर्थिक हित पश्चिम एशिया से जुड़े हुए हैं।
यदि क्षेत्रीय युद्ध लंबा चलता है तो वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार और आर्थिक स्थिरता पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। भारत को इस संभावित संकट के लिए पहले से तैयार रहना होगा।
यही कारण है कि भारत को अपनी विदेश नीति में बहुध्रुवीय संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। भारत को अमेरिका, रूस, ईरान, अरब देशों और पश्चिमी शक्तियों के साथ संबंधों को व्यावहारिक दृष्टिकोण से संतुलित करना होगा।
भारत की नई कूटनीतिक दिशा
आज भारत के सामने सबसे बड़ा अवसर यह है कि वह केवल प्रतिक्रियात्मक शक्ति न रहकर एजेंडा तय करने वाली शक्ति बने।
भारत को अपनी कूटनीति में पाँच बड़े परिवर्तन करने होंगे:
रणनीतिक आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता
रक्षा, तकनीक और ऊर्जा में बाहरी निर्भरता कम करनी होगी।
सौदेबाजी आधारित विदेश नीति
वैश्विक शक्तियों के साथ संबंधों में भावनात्मकता नहीं बल्कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होने चाहिए।
आर्थिक शक्ति को कूटनीति का आधार बनाना
मजबूत अर्थव्यवस्था ही प्रभावी विदेश नीति की वास्तविक शक्ति होती है।
क्षेत्रीय नेतृत्व का विस्तार
दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में दीर्घकालिक रणनीतिक निवेश बढ़ाना होगा।
तकनीकी और सैन्य आधुनिकीकरण
भविष्य की जियोपॉलिटिक्स तकनीक आधारित होगी। साइबर, एआई, स्पेस और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भारत को निर्णायक निवेश करना होगा।
निष्कर्ष
विश्व व्यवस्था तेजी से बदल रही है। पुराने गठबंधन कमजोर हो रहे हैं और नए शक्ति संतुलन उभर रहे हैं। इस बदलते समय में भारत के सामने चुनौतियाँ भी बड़ी हैं और अवसर भी।
ब्रिक्स में सीमित सफलता के बाद अब क्वाड भारत के लिए नया रणनीतिक मंच बन सकता है। लेकिन केवल सम्मेलन आयोजित कर लेना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को स्पष्ट, आत्मविश्वासी और दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी।
आज की जियोपॉलिटिक्स नैतिक भाषणों से नहीं बल्कि शक्ति, आर्थिक क्षमता और रणनीतिक सौदेबाजी से संचालित होती है। यदि भारत इस वास्तविकता को समझकर अपनी विदेश नीति को पुनर्गठित करता है तो वह न केवल दक्षिण एशिया बल्कि पूरे इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में निर्णायक शक्ति बन सकता है।
आने वाले दशक में वही देश सुरक्षित और प्रभावशाली रहेंगे जो बदलती वैश्विक राजनीति को समय रहते समझ लेंगे। भारत के पास अभी अवसर है—और शायद यही सही समय भी।
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