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वक्त तो लगता है"

वक्त तो लगता है"

        रचना - डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
दिल की बात कहने में वक्त तो लगता है,
अपनों को भी अपनाने में वक्त तो लगता है।

ख्वाब आँखों में यूँ ही नहीं उतर आते हैं,
नींद को भी गहराई मिलने में वक्त तो लगता है।

रास्ते खुद-ब-खुद आसान नहीं हो जाते,
ठोकरों से सँभलने में वक्त तो लगता है।

भीड़ में नाम तो हर कोई कमा लेता है,
दिल में जगह बनाने में वक्त तो लगता है।

सूखे रिश्तों में हरियाली तो नहीं आ जाती,
प्यार को फिर से पनपने में वक्त तो लगता है।

तजुर्बा यूँ ही नहीं मिलता किताबों से कभी,
ज़िंदगी को समझने में वक्त तो लगता है।
मक़ता:
'राकेश' हर बात तुरंत समझ में नहीं आती,
अर्थ को शब्द से मिलने में वक्त तो लगता है।
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