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"धर्मसम्मत विजय का सत्य"

"धर्मसम्मत विजय का सत्य"

 पंकज शर्मा 
मित्रों मानव-जीवन के संघर्षों में विजय की आकांक्षा स्वाभाविक है, किन्तु उसका साधन यदि अन्यायपूर्ण हो, तो वही विजय आत्मविनाश का कारण बन जाती है। प्रतिद्वंद्वी का पराभव तभी सार्थक है, जब वह धर्म एवं नैतिकता की मर्यादाओं के भीतर संपन्न हो। अन्यथा, क्षणिक सफलता भी अंततः पतन का द्वार खोलती है। इसी सत्य को यह श्लोक उद्घाटित करता है—
“अधर्मेण जयन्नित्यं, न स विजयी कथंचन।”
अर्थात् अधर्म से प्राप्त हुई विजय कभी वास्तविक विजय नहीं होती।


वास्तविक पराक्रम वह है, जो न्याय, संयम एवं सत्य के आधार पर अर्जित हो। जब मनुष्य अपने उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु नैतिक पथ का त्याग करता है, तब वह बाह्य शत्रु को भले ही परास्त कर ले, परन्तु अंतःकरण में स्वयं पराजित हो जाता है। अतः आवश्यक है कि हम संघर्ष में भी धर्म का आश्रय लें, क्योंकि वही हमें स्थायी सम्मान एवं आत्मशांति प्रदान करता है।


. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
 पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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