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भारत की शाश्वत मेधा: गुरुकुल से डिजिटल क्रांति

भारत की शाश्वत मेधा: गुरुकुल से डिजिटल क्रांति

सत्येंद्र कुमार पाठक
वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर में भारतीय चिंतन में शिक्षा केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं, बल्कि आत्मिक बोध का मार्ग है। "ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः" (बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं) के सूत्र वाक्य ने भारत को सदियों तक 'विश्वगुरु' के पद पर प्रतिष्ठित रखा। हिमालय की कंदराओं से लेकर मगध के उपजाऊ मैदानों तक, भारत की शिक्षा पद्धति ने वह आधार तैयार किया जिसने शून्य (0) से लेकर खगोल विज्ञान और अध्यात्म तक का मार्ग प्रशस्त किया। युगों का कालचक्र: सतयुग से द्वापर तक का शैक्षिक दर्शन में भारतीय वाङ्मय के अनुसार, शिक्षा व्यवस्था काल की गति के साथ विकसित हुई है: सतयुग और त्रेतायुग (दिव्य और तपोवन शिक्षा): इस काल में शिक्षा पूरी तरह से 'तपोवन' आधारित थी। ऋषि वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे ऋषियों के आश्रम में प्रकृति के सानिध्य में शिष्य रहते थे। यहाँ अस्त्र-शस्त्र के साथ 'ब्रह्मविद्या' का ज्ञान दिया जाता था। मर्यादा पुरुषोत्तम राम की शिक्षा वशिष्ठ मुनि के आश्रम में हुई, जहाँ उन्होंने न केवल वेदों का ज्ञान लिया बल्कि 'समरसता' और 'त्याग' के मूल्यों को आत्मसात किया। द्वापरयुग (कौशल और रणनीति): यह युग विशिष्टीकरण (Specialization) का था। गुरु संदीपनी के आश्रम में श्रीकृष्ण ने 'चौंसठ कलाओं' की शिक्षा ली, जो आज के 'स्किल डेवलपमेंट' का प्राचीन स्वरूप था। द्रोणाचार्य का गुरुकुल सैन्य विज्ञान (धनुर्वेद) का सबसे बड़ा केंद्र था। यहाँ शिक्षा 'व्यक्तिगत योग्यता' और 'कर्तव्यबोध' पर केंद्रित थी।
. वैदिक काल: ऋचाओं का गुंजन और 'श्रुति' परंपरा वैदिक काल (१५००-८०० ईसा पूर्व) भारतीय शिक्षा का स्वर्णिम आधार स्तंभ है। इस काल की विशेषताएँ अद्वितीय थीं: उपनयन और ब्रह्मचर्य: बालक की शिक्षा का प्रारंभ 'उपनयन संस्कार' से होता था। इसके बाद उसे 'द्विज' (दूसरा जन्म) माना जाता था। वह गुरु के घर (आश्रम) में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करता था। श्रुति और कंठस्थ विद्या: उस समय लिपि का आविष्कार होने के बावजूद ज्ञान का संचार मौखिक था। गुरु मंत्रों का उच्चारण करते थे और शिष्य उन्हें सुनकर हृदयंगम करते थे। इससे स्मरण शक्ति (Memory) का अद्भुत विकास होता था। पाठ्यक्रम का विस्तार: चारों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद), षडङ्ग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष), और उपनिषदों का गहन अध्ययन कराया जाता था।
प्राचीन बिहार की वैश्विक मेधा: तक्षशिला और नालंदा मगध की धरती ने विश्व को संगठित विश्वविद्यालय प्रणाली दी। तक्षशिला (प्रथम वैश्विक केंद्र): गांधार क्षेत्र में स्थित तक्षशिला में १८ शिल्पों और १८ वेदों की शिक्षा दी जाती थी। यहाँ के छात्र चाणक्य, चरक और पाणिनी ने पूरी दुनिया के ज्ञान का रुख मोड़ दिया। नालंदा (ज्ञान का महासागर): बिहार स्थित नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध दर्शन, तर्कशास्त्र और चिकित्सा विज्ञान के १०,००० छात्र पढ़ते थे। यहाँ प्रवेश पाना अत्यंत कठिन था; द्वारपाल स्वयं परीक्षा लेते थे। ह्वेनसांग जैसे चीनी यात्रियों ने यहाँ की बौद्धिक श्रेष्ठता का सविस्तार वर्णन किया है। विक्रमशिला और ओदंतपुरी: पाल राजाओं के संरक्षण में यहाँ तंत्रयान और कला की शिक्षा दी गई, जिसने तिब्बत और दक्षिण-पूर्व एशिया को प्रभावित किया।
शिक्षा में स्त्री-शक्ति: गार्गी से भारती तक - वैदिक और प्राचीन काल में महिलाएँ शिक्षा से वंचित नहीं थीं। उन्हें 'ब्रह्मवादिनी' कहा जाता था। गार्गी और मैत्रेयी: राजा जनक की सभा में गार्गी ने याज्ञवल्क्य को अपने तर्कों से चकित कर दिया था। भारती (मण्डन मिश्र की पत्नी): शंकराचार्य के साथ शास्त्रार्थ में उन्होंने निर्णायक की भूमिका निभाई। उन्होंने सिद्ध किया कि ज्ञान में स्त्री और पुरुष का भेद नहीं है। सावित्रीबाई फुले और आधुनिक चेतना: मध्यकाल के अंधकार के बाद सावित्रीबाई फुले ने आधुनिक स्त्री शिक्षा की नींव रखी, जो आज के शिक्षित समाज का आधार है।
मध्यकाल और औपनिवेशिक काल: संक्रमण और पतन - मुगल काल: इस दौरान 'मदरसा' और 'मकतब' संस्कृति आई। फारसी और अरबी शिक्षा के साथ-साथ हुनर (शिल्प) को बढ़ावा मिला, लेकिन पारंपरिक संस्कृत पाठशालाएँ आर्थिक अभाव के कारण सिमटने लगीं।
ब्रिटिश काल (मैकाले की नीति): १८३५ में लॉर्ड मैकाले ने भारतीय गुरुकुल व्यवस्था को जड़ से उखाड़ने का प्रयास किया। उसका उद्देश्य "काले अंग्रेज" तैयार करना था जो प्रशासनिक कार्यों में क्लर्क की भूमिका निभा सकें। इससे भारत की 'साक्षरता दर' (जो विलियम एडम के अनुसार गाँवों में बहुत अधिक थी) तेजी से गिर गई।
आधुनिक काल में डिजिटल क्रांति और भविष्य की शिक्षा २१वीं सदी के 'ज्ञान आधारित समाज' में प्रवेश कर चुकी है। अब शिक्षा ब्लैकबोर्ड से 'स्मार्ट बोर्ड' और स्मार्टफोन तक आ गई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा साइंस शिक्षा के नए हथियार हैं। नई शिक्षा नीति भारत को पुनः अपनी जड़ों (मातृभाषा, भारतीय ज्ञान परंपरा) से जोड़ने और भविष्य के कौशलों (कोडिंग, रिसर्च) के लिए तैयार करने का एक साहसी प्रयास है।
मगध की भूमि जहाँ बुद्ध को ज्ञान मिला, आज फिर से जाग रही है। उपक्रमों के माध्यम से हम उस लुप्त होती ऐतिहासिक चेतना को संजो रहे हैं। गुरुकुल से शुरू होकर डिजिटल क्लाउड तक पहुँची यह यात्रा दर्शाती है कि माध्यम बदल सकते हैं, लेकिन 'ज्ञान की प्यास' सदैव शाश्वत रहती है। भारत को पुनः 'विश्वगुरु' बनाने के लिए हमें वैदिक काल के 'संस्कार' और आधुनिक काल की 'तकनीक' का समन्वय करना होजिस दिन हमारे युवा गूगल से जानकारी और गुरुकुल से विवेक (Wisdom) लेना सीख जाएंगे, उस दिन भारत का स्वर्णिम युग लौट आएगा।
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