कालचक्र की यात्रा: सतयुग से कलियुग तक चैत्र नवरात्र सूर्य-शक्ति परंपरा
सत्येन्द्र कुमार पाठक
समय का चक्र और भारतीय चेतना में भारतीय दर्शन में समय 'रैखिक' नहीं, बल्कि 'वृत्ताकार' है। यह एक ऐसा अनंत पहिया है जो सृजन, विकास, पतन और पुनरुद्धार के चरणों से गुजरता है। इस चक्र को हम 'युग' कहते हैं। मगध की ऐतिहासिक धरती, विशेषकर जहानाबाद और गया का क्षेत्र, इस कालचक्र के हर चरण का साक्षी रहा है। यहाँ की मिट्टी में दबे पुरातात्विक अवशेष और यहाँ के लोक-पर्व 'छठ' और 'चैत्र नवरात्रि' इसी शाश्वत सत्य के उद्घोषक हैं।
युग-चक्र का विज्ञान और आध्यात्मिक महत्व - हिंदू काल-गणना के अनुसार, सृष्टि चार युगों से होकर गुजरती है। यह विभाजन केवल नैतिक नहीं, बल्कि चेतना के स्तर पर आधारित है।
सतयुग (स्वर्ण युग): यह पूर्ण सत्य का युग था। चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिन (प्रतिपदा) को इसी युग और सृष्टि का आरंभ माना जाता है। इस काल में मनुष्य और प्रकृति के बीच कोई द्वंद्व नहीं था।
त्रेतायुग (रजत युग): इस युग में 'मर्यादा पुरुषोत्तम' श्री राम का अवतार हुआ। राम नवमी इसी युग की परिणति है, जो सिखाती है कि शक्ति (दुर्गा) के साथ शील (राम) का होना अनिवार्य है।
द्वापरयुग (कांस्य युग): कर्मयोग और कूटनीति का युग। भगवान कृष्ण ने धर्म की स्थापना के लिए पुरुषार्थ का मार्ग दिखाया। मगध के संदर्भ में जरासंध और भीम का द्वंद्व इसी युग की गाथा है।
कलियुग (लौह युग): वर्तमान समय, जहाँ धर्म केवल एक स्तंभ पर टिका है। इसमें 'नाम संकीर्तन' और 'दान' ही मोक्ष के साधन हैं। विज्ञान इसे सौर मंडल की विशिष्ट स्थिति से जोड़कर देखता है।
: चैत्र नवरात्रि और हिंदू नववर्ष (नवसंवत्सर) -चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा केवल कैलेंडर का बदलाव नहीं है। ब्रह्म पुराण के अनुसार, इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना का संकल्प लिया था। शक्ति उपासना: नौ दिनों तक माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा 'महिषासुर वध' की याद दिलाती है—जो हमारे भीतर की नकारात्मकता के विनाश का प्रतीक है। ऋतु परिवर्तन का विज्ञान: यह वसंत ऋतु का समय है। प्रकृति पुराने पत्तों को त्यागकर नए पल्लव धारण करती है। यह 'पुनर्जन्म' का संदेश है :
मगध का गौरव और 'अर्क-क्षेत्र' की अवधारणा मगध का इतिहास विश्व के महानतम साम्राज्यों का गवाह रहा है, लेकिन इसका आध्यात्मिक केंद्र 'सूर्य उपासना' है। जहानाबाद, गया , औरंगाबाद , नालंदा , अरवल , नवादा , पटना , भोजपुर , रोहतास , बक्सर , कैमूर का क्षेत्र प्राचीन काल से 'अर्क-क्षेत्र' कहलाता रहा है।. छठ पूजा: प्रकृति और सूर्य का महामिलन में छठ पूजा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक 'लिविंग हेरिटेज' है। ऐतिहासिक साक्ष्य: त्रेतायुग में माता सीता द्वारा मुंगेर में सूर्य पूजा और द्वापर में साम्ब (कृष्ण पुत्र) द्वारा कुष्ठ रोग से मुक्ति के लिए सूर्य मंदिरों की स्थापना इसके प्राचीन आधार हैं। सामाजिक समरसता: मगध में छठ के घाटों पर अमीर-गरीब, जाति-पांति का भेद मिट जाता है। बाँस की टोकरी (डोम) और मिट्टी के दीये (कुम्हार) के बिना यह पूजा अधूरी है। मगध में 'उलार', 'औंगारी', 'देवकुण्ड' और 'देव' के सूर्य मंदिर एक आध्यात्मिक श्रृंखला बनाते हैं। जहानाबाद से गुजरने वाला प्राचीन व्यापारिक मार्ग इन मंदिरों को जोड़ता था। बराबर की गुफाएँ—स्थापत्य और ध्वनि का रहस्य
जहानाबाद की पहचान बराबर की पहाड़ियाँ (खलतिक पर्वत) मौर्यकालीन वैभव का शिखर हैं। सम्राट अशोक के शिलालेख: यहाँ की गुफाओं में खुदे ब्राह्मी लिपि के अक्षर 'धम्म' और 'सहिष्णुता' की गूँज हैं। अशोक ने ये गुफाएँ अजीवक संप्रदाय को दान दी थीं, जो मगध के उदार हृदय का प्रमाण है। अकुस्टिक्स (ध्वनि विज्ञान): सुदामा और लोमश ऋषि गुफाओं की दीवारों की पॉलिश और उनकी बनावट ऐसी है कि वहाँ किया गया 'ओम' का उच्चारण अनंत काल तक गूँजता प्रतीत होता है। यह प्राचीन भारत के इंजीनियरिंग कौशल का चमत्कार है।जहानाबाद का धराउत क्षेत्र, जिसे प्राचीन 'चंद्र विहार' माना जाता है, पाल कालीन कला का केंद्र था। ह्वेनसांग ने भी यहाँ की यात्रा की थी। घेजन से प्राप्त मूर्तियाँ यह सिद्ध करती हैं कि मगध में हिंदू और बौद्ध परंपराएं साथ-साथ फल-फूल रही थी। मगध की लोक-गाथाएँ और मगही भाषा हमारी पहचान हैं। आज जब हम दिव्यांशु और प्रियांशु जैसे बच्चों को इन पहाड़ियों और मंदिरों की सैर कराते हैं, तो हम वास्तव में उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ रहे होते हैं। इतिहास केवल बीता हुआ कल नहीं है, बल्कि वह आने वाले कल की नींव है। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में मगध की भूमिका में आज पूरा विश्व जब 'क्लाइमेट चेंज' और 'मानसिक तनाव' से जूझ रहा है, तब मगध की सूर्य उपासना (प्रकृति प्रेम) और नवरात्रि (आंतरिक शक्ति) का संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। हमें अपनी इन विरासतों—बराबर की गुफाओं, सूर्य मंदिरों और पौराणिक काल-गणना—को सहेजना होगा ताकि विश्व जान सके कि ज्ञान की रश्मि सर्वप्रथम मगध के क्षितिज से ही फूटी थी।
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