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हिन्दू समाज में जातियों का विभाजन : इतिहास और वास्तविकता

हिन्दू समाज में जातियों का विभाजन : इतिहास और वास्तविकता

लेखक -----
✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
प्रख्यात विचारक ओशो रजनीश ने एक स्थान पर कहा है—
“जब से मैंने होश संभाला है, हिन्दुओं को आपस में लड़ते देखा है; और उसका परिणाम यह हुआ कि हिन्दू समाज लगातार कमजोर होता गया।”
यह कथन केवल एक व्यक्ति की टिप्पणी नहीं, बल्कि हमारे समाज के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्न है।
सिनेमा, साहित्य, राजनीतिक भाषणों और सामाजिक चर्चाओं—में विभिन्न जातियों के बारे में कई प्रकार की रूढ़ धारणाएँ प्रचारित की जाती रही हैं। जिसे हम देखते, पढ़ते और सुनते आए हैं।
कहीं कहा जाता है—
🔹बनिया कंजूस होता है…
🔹नाई अत्यंत चतुर होता है…
🔹ब्राह्मण धर्म के नाम पर लोगों को भ्रमित करता है…
🔹यादव की बुद्धि कमजोर होती है…
🔹राजपूत अत्याचारी होते हैं…
🔹दलित अस्वच्छ होते हैं…
🔹जाट, गुर्जर या दुसाध बिना कारण लड़ने वाले होते हैं…
🔹मारवाड़ी लालची होते हैं…
इस प्रकार की असंख्य धारणाएँ समाज में बार-बार दोहराई जाती रही हैं। परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे लोगों के मन में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास और हीन-भावना घर करने लगी। जो समाज हजारों वर्षों तक सांस्कृतिक रूप से जुड़ा रहा, उसमें परस्पर दूरी और टकराव की प्रवृत्ति बढ़ने लगी।
यही कारण है कि आज यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—
*क्या वास्तव में हिन्दू समाज सदैव जातियों में विभाजित था, या फिर यह विभाजन समय के साथ कुछ शक्तियों द्वारा कराया गया?*
इस प्रकार सभी जातियों को लेकर गलत-गलत धारणाएं और ना जाने ऐसी कितनी असत्य परम ज्ञान की बातें, लोगों के कानों में भरना या इस प्रकार की गलत अवधारणाएं अनेक माध्यम से फैलाकर सभी हिन्दुओं को खंड-खंड करने का प्रयास चलता रहा है। जिसका असर आहिस्ते-आहिस्ते सिखाई देने लगा है ।
नतीजा!
एक दूसरे के प्रति हीन भावना बैठता गया ।
एक दूसरे जाति पर शक और द्वेष धीरे-धीरे आपस में टकराव होना शुरू हुआ और अंतिम परिणाम हुआ कि मजबूत, कर्मयोगी और सहिष्णु हिन्दू समाज आपस में ही लड़कर कमजोर होने लगा .....।
जब वैदिक शास्त्रों में जाति व्यवस्था एक सशक्त और प्रगतिशील समाज की निर्माण का मूल मंत्र बताया गया है ।
तब फिर यहां पर एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है--- कब और किन लोगों के द्वारा इस तरह हिंदुओं को तोड़ने की साजिश आरंभ हुआ?
साजिश कर्ताओं को उनका लक्ष्य प्राप्त हुआ ! जहां आप हजारों साल से आप साथ थे -- आपसे लड़ना मुश्किल था ।
अब आपको (हिंदुओं को) मिटाना आसान है !!
आज भी यही एजेंडा चलाया जा रहा है खासकर राजनीतिक पार्टियों के द्वारा, जातिवाद के नाम पर लोग गुमराह हो रहे हैं।
जबकि हर जाति के लोगों को पूछना चाहिए कि,-- अगर राजपूत अत्याचारी थे तो अत्याचारी राजपूतों ने सभी जातियों की रक्षा के लिए हमेशा अपना खून क्यों बहाया ❓
पूछना कि अगर दलित को ब्राह्मण इतना ही गन्दा समझते थे तो वेदव्यास (वेदों के रचयिता),बाल्मीकि (रामायण के रचयिता),संत रैदास, कबीरदास, चोखामेला, नामदेव, नंदनार, कनकदास, गोरा कुम्हार
रोहिदास / रोहिदास जी
सेवाभाई / सेवालाल महार,
संत जगजीवनदास,भक्त पीपा, साधना, धन्ना,भक्त सेन, त्रिलोचन जैसे हजारों की संख्या में रहे हैं जो एक दलित थे उसकी पूजा/ आराधना सभी ब्राह्मण क्यों करते हैं ❓
माता सीता क्यों महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहती ❓
अगर मारवाड़ी बनिया चोर होता है तो क्यों नहीं पूछते उन नेताओं से कि आपको सोने का चिड़ियाँ बनाने में मारवाड़ियों और बनियों का क्या योगदान क्या योगदान रहा है❓
लाखों की संख्या में धर्मशाला, मंदिर ,स्कूल और हॉस्पिटल बनाने वाले लोक कल्याण का काम करने वाले बनिया होते हैं! सभी को रोजगार देने वाले बनिया होते हैं! सबसे ज्यादा आयकर देने वाले बनिया होते हैं ....
ब्राह्मणों के घर में भी बच्चा होने पर प्रसूति को पानी पिलाने वाली डगरिन/ चमइन, जिसे नीच जाति का कहा जाता है
जिस डोम को आपने नीच मान लिया, उसी के हाथ से दी गई अग्नि से सबको मुक्ति क्यों मिलती है।
बिना धोबी के धोए बिना कपड़ा शुद्ध नहीं होता ऐसी व्यवस्था ब्राह्मणों ने क्यों बनाया था ❓
जाट और गुर्जर अगर मेहनती लड़ाके नहीं होते तो आपके लिए अन्न का उत्पादन कौन करता, सेना में भर्ती कौन होता ❓
भारतीय परम्परा के मूल ग्रन्थों में समाज को कर्तव्य-आधारित व्यवस्था के रूप में देखा गया है। विभिन्न कार्यों के आधार पर समाज का संगठन किया गया था ताकि प्रत्येक वर्ग अपनी भूमिका निभाते हुए समाज की समग्र उन्नति में योगदान दे सके। मूल उद्देश्य सहयोग और संतुलन था, न कि परस्पर घृणा या विभाजन।
यदि वास्तव में जातियों के बीच अटूट दीवारें होतीं, तो फिर यह कैसे संभव हुआ।
अनेक ऐसे संत-महापुरुष, जिनका जन्म दलित या शोषित - वंचित समाज में हुआ, पूरे हिन्दू समाज के साथ साथ ब्राह्मणों का आराध्य और पूज्य है ?
यदि समाज पूर्णतः विभाजित और कठोर होता, तो क्या इन संतों को इतना व्यापक सम्मान मिल पाता?
इतिहास में यह भी देखा जाता है कि विभिन्न समुदायों ने अपनी-अपनी भूमिका निभाकर समाज की रक्षा और उन्नति में योगदान दिया। अनेक वीर राजपूतों ने देश और धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए। व्यापार और उद्योग के क्षेत्र में वैश्य और मारवाड़ी समाज ने आर्थिक समृद्धि और दान-पुण्य की परम्परा को आगे बढ़ाया—धर्मशालाएँ, मंदिर, विद्यालय और चिकित्सालय उनके दान से स्थापित हुए। कृषक समुदायों ने अन्न उत्पादन द्वारा समाज का पालन किया, जबकि अन्य अनेक समुदायों ने सेवा और श्रम से सामाजिक जीवन को सुचारु बनाया।
इस व्यापक दृष्टि से देखें तो स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज का वास्तविक आधार परस्पर निर्भरता और सहयोग रहा है। समाज का प्रत्येक वर्ग किसी न किसी रूप में आवश्यक और सम्माननीय रहा है।
दुर्भाग्य से आधुनिक समय में राजनीति और स्वार्थपूर्ण विचारधाराओं ने जातीय पहचान को संघर्ष का माध्यम बना दिया। समाज को एकजुट करने के बजाय उसे छोटे-छोटे वर्गों में बाँटकर देखने की प्रवृत्ति बढ़ी। परिणामस्वरूप परस्पर अविश्वास और वैमनस्य की भावना को बढ़ावा मिला।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इतिहास और परम्परा को संतुलित दृष्टि से समझें। किसी भी जाति या समुदाय के बारे में अपमानजनक या सामान्यीकृत धारणाएँ समाज को कमजोर करती हैं।
हिन्दू संस्कृति का मूल संदेश सदैव यही रहा है कि मनुष्य की श्रेष्ठता उसके कर्म, ज्ञान और आचरण से निर्धारित होती है, न कि केवल जन्म से।
इसलिए आवश्यक है कि हम जातीय पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर समाज में सम्मान, सहयोग और सद्भाव की भावना को पुनः सशक्त करें।
जब हम एक-दूसरे को प्रतिद्वन्द्वी नहीं, बल्कि सहयात्री के रूप में देखेंगे, तभी एक सशक्त और समरस समाज का निर्माण संभव होगा।
अंततः यही स्मरण रखना चाहिए—
समाज की शक्ति उसके विभाजन में नहीं, बल्कि उसकी एकता और परस्पर सम्मान में निहित होती है।
जैसे ही कोई किसी जाति की, कोई मामूली सी भी, बुरी बात करे, उसे टोकिये और उस पर नाराजगी व्यक्त कीजिये , अगर नेता जनता को गुमराह करें तो उसे नेता एवं उसे पार्टी को अपना बहूमूल्य मत भूल कर भी नहीं दे।
*जात-पात का करो विदाई!*
*हम सब हिंदू भाई-भाई !!*
याद रहे!
आप सिर्फ हिन्दू हैं। हिन्दू वो जो हिन्दूस्तान में रहते आये हैं ।
जब समाज अपने ही लोगों के बीच दीवारें खड़ी कर लेता है, तब उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है।
और जब वह परस्पर सम्मान और सहयोग को अपनाता है, तब वही समाज अजेय बन जाता है।
हम सनातनी कभी किसी अन्य धर्म का अपमान नहीं किया तो फिर अपने ही हिन्दू भाइयों को अपमानित क्यों करना ❓
अब न अपमानित करेंगे और न होने देंगे!
एक रहेंगे ! सशक्त रहेंगे...!!
मिलजुल कर मजबूत भारत का निर्माण करें !!
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