प्रणय प्रसून खिलते रहें,परिणय उपवन में
कुमार महेंद्रदिव्य भव्य दांपत्य श्रृंगार,
प्रतिपल अनंत नेह वृष्टि ।
कांतिमय अंग सौष्ठव,
आनंद जन्य पावन दृष्टि ।
उर तरंग चाहत स्पंदन,
सदा मिलन स्तुति चितवन में ।
प्रणय प्रसून खिलते रहें,परिणय उपवन में ।।
मृदुल मधुर अहसास,
विमल पुनीत हिय भावना ।
शुभ मंगल सरित प्रवाह,
असीम खुशियां कामना ।
अपनत्व स्पर्श शिखर बिंदु,
अलौकिक संबंध उन्नयन में ।
प्रणय प्रसून खिलते रहें,परिणय उपवन में ।।
प्रियतम बन आशाएं ,
हर क्षण संग गमन ।
अथाह स्वर माधुर्य ,
जीवन नवरंग रमन।
मुखारबिंद लावण्य निर्झर,
हर्ष उल्लास उमंग मधुवन में ।
प्रणय प्रसून खिलते रहें,परिणय उपवन में ।।
अंतःकरण कैनवास पटल,
मिलन मोहक अनूप चित्र ।
भाव भंगिमा स्नेहिल छवि,
प्रेम प्रतिरूप दर्श पवित्र ।
रोम रोम सिय राम रमन,
सप्त जन्म बंधन पल्लवन में।
प्रणय प्रसून खिलते रहें, परिणय उपवन में।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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