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जहानाबाद लोकसभा क्षेत्र का ऐतिहासिक सफर

जहानाबाद लोकसभा क्षेत्र का ऐतिहासिक सफर

सत्येन्द्र कुमार पाठक
वैचारिक क्रांतियों और सामाजिक न्याय की प्रयोगशाला बिहार की राजनीति में मगध क्षेत्र का हमेशा से एक विशिष्ट और निर्णायक स्थान रहा है। इसी मगध के केंद्र में स्थित है—जहानाबाद लोकसभा क्षेत्र। यह सिर्फ एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि बिहार के राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक आंदोलनों की जीवंत प्रयोगशाला है। एक तरफ जहाँ इसे वामपंथी आंदोलनों और वर्ग-संघर्ष की भूमि के रूप में जाना गया, वहीं दूसरी तरफ यह सामाजिक न्याय और मंडल राजनीति का भी एक बड़ा केंद्र बनकर उभरा।।जहानाबाद के मतदाताओं की सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि वे कभी भी किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा के साथ बंधकर नहीं रहे। उन्होंने राष्ट्र निर्माण के शुरुआती दौर में कांग्रेस की नीतियों को सराहा, साठ और अस्सी के दशक में कम्युनिस्ट विचारधारा को मजबूती दी, और नब्बे के दशक के बाद क्षेत्रीय अस्मिता व सामाजिक न्याय के नाम पर राजद और जदयू जैसी ताकतों को बारी-बारी से सत्ता की चाबी सौंपी।
, 1957 से लेकर 2024 तक के आम चुनावों के आंकड़ों, प्रमुख राजनीतिक चेहरों और बदलते समीकरणों के आईने में जहानाबाद लोकसभा क्षेत्र के इस बेहद दिलचस्प और उतार-चढ़ाव भरे सफर में जहानाबाद के संसदीय इतिहास को समझने के लिए सबसे पहले इसके प्रतिनिधित्व के आंकड़ों को देखना जरूरी है। 1957 से लेकर अब तक यहाँ से चुने गए सांसदों और उनके दलों की पूरी सूची नीचे दी गई है:
चुनाव वर्ष निर्वाचित सांसद का नाम संबद्ध राजनीतिक दल
1957 सत्यभामा देवी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1962 सत्यभामा देवी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1967 चंद्रशेखर सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
1971 चंद्रशेखर सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
1977 हरिलाल प्रसाद सिन्हा जनता पार्टी
1980 महेंद्र प्रसाद (किंग महेंद्र) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1984 रामाश्रय प्रसाद सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
1989 रामाश्रय प्रसाद सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
1991 रामाश्रय प्रसाद सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
1996 रामाश्रय प्रसाद सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
1998 सुरेंद्र प्रसाद यादव राष्ट्रीय जनता दल
1999 डॉ. अरुण कुमार जनता दल (यूनाइटेड)
2004 गणेश प्रसाद सिंह यादव राष्ट्रीय जनता दल
2009 डॉ. जगदीश शर्मा जनता दल (यूनाइटेड)
2014 डॉ. अरुण कुमार राष्ट्रीय लोक समता पार्टी
2019 चंदेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी जनता दल (यूनाइटेड)
2024 सुरेंद्र प्रसाद यादव राष्ट्रीय जनता दल
जहानाबाद के इस 67 से अधिक वर्षों के संसदीय इतिहास को मुख्य रूप से चार बड़े वैचारिक और राजनीतिक युगों में विभाजित करके समझा जा सकता है। नेहरू युग और कांग्रेस का शुरुआती वर्चस्व (1957 - 1966) - आजादी के बाद जब देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनी जड़ें जमा रही थी, तब जहानाबाद (जो शुरुआती दौर में गया संसदीय क्षेत्र का हिस्सा और बाद में स्वतंत्र सीट के रूप में उभरा) पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पूर्ण नियंत्रण था।।इस दौर का प्रतिनिधित्व सत्यभामा देवी ने किया। उन्होंने 1957 और फिर 1962 के आम चुनावों में लगातार जीत हासिल की। यह वह दौर था जब मतदाता मुख्य रूप से स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों, महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के करिश्मे से प्रभावित थे। इस समय विकास के बड़े वादे और बुनियादी ढांचे का निर्माण ही राजनीति के मुख्य बिंदु हुआ करते थे।
लाल झंडे का उभार और कम्युनिस्ट आंदोलन का स्वर्ण काल (1967 - 1996) - 1960 के दशक के उत्तरार्ध में जहानाबाद और उसके आस-पास के इलाकों में कृषि संकट, जमींदारी व्यवस्था के अवशेषों के खिलाफ असंतोष और बटाईदारों के अधिकारों को लेकर सुगबुगाहट शुरू हुई। इसके परिणामस्वरूप यहाँ वामपंथ ने अपनी मजबूत जमीन तैयार की।
चंद्रशेखर सिंह की एंट्री: 1967 और 1971 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के टिकट पर चंद्रशेखर सिंह ने जीत दर्ज कर कांग्रेस के अभेद्य किले को ढहा दिया।
1977 की आपातकाल विरोधी लहर: आपातकाल के बाद 1977 में पूरे देश की तरह जहानाबाद में भी कांग्रेस विरोधी लहर चली और जनता पार्टी के हरिलाल प्रसाद सिन्हा यहाँ से जीतकर संसद पहुंचे।
'किंग महेंद्र' का आगमन: 1980 में इंदिरा गांधी की वापसी के साथ ही कांग्रेस ने यहाँ एक बड़ा दांव खेला। भारतीय राजनीति और कॉर्पोरेट जगत के कद्दावर चेहरे महेंद्र प्रसाद (जिन्हें दुनिया 'किंग महेंद्र' के नाम से जानती है) ने कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की। रामाश्रय प्रसाद सिंह का रिकॉर्ड युग: 1984 के बाद जहानाबाद पूरी तरह से कम्युनिस्ट पार्टी के 'लाल गढ़' में तब्दील हो गया। CPI के दिग्गज नेता रामाश्रय प्रसाद सिंह ने 1984, 1989, 1991 और 1996 के चुनावों में लगातार चार बार जीत हासिल कर एक नया इतिहास रचा। यह वह दौर था जब जहानाबाद की धरती पर वैचारिक रूप से बेहद तीखे संघर्ष और राजनीतिक गोलबंदी देखी गई। नब्बे के दशक में देश और विशेषकर बिहार की राजनीति ने करवट ली। मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद जातिगत चेतना और सामाजिक न्याय की राजनीति हावी हो गई। जहानाबाद भी इससे अछूता नहीं रहा और यहाँ वामपंथ का जनाधार धीरे-धीरे क्षेत्रीय समाजवादियों की ओर खिसक गया।
राजद की पहली दस्तक: 1998 में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने यहाँ अपना खाता खोला और सुरेंद्र प्रसाद यादव पहली बार सांसद चुने गए। राजद बनाम जदयू की जंग: इसके बाद से यह सीट बिहार के दो बड़े क्षत्रपों (लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार) की आपसी जंग का मुख्य अखाड़ा बन गई। 1999 में जदयू के डॉ. अरुण कुमार ने बाजी मारी। 2004 में फिर से राजद के गणेश प्रसाद सिंह यादव विजयी हुए। 2009 के चुनाव में नीतीश कुमार की लहर पर सवार होकर जदयू के डॉ. जगदीश शर्मा ने जीत हासिल की।
2014 के आम चुनाव ने भारतीय राजनीति के साथ-साथ जहानाबाद के मिजाज को भी बदला, हालांकि यहाँ का नतीजा बिहार के अन्य क्षेत्रों से थोड़ा अलग रहा। 2014 का चुनाव: राष्ट्रीय स्तर पर 'मोदी लहर' के बावजूद यह सीट भाजपा ने अपने सहयोगी दल राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को दी, और डॉ. अरुण कुमार एक बार फिर संसद पहुंचने में कामयाब रहे।।2019 का कांटे का मुकाबला: 2019 में एनडीए के तहत यह सीट जदयू के खाते में गई और चंदेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी यहाँ से सांसद बने। इस चुनाव की चर्चा देश भर में हुई क्योंकि जीत-हार का अंतर बेहद मामूली (मात्र कुछ हजार वोट) था, जिसने साबित किया कि जहानाबाद में मुकाबला हमेशा त्रिशंकु और अत्यधिक कड़ा होता है। 2024 में 'लालटेन' की वापसी: हाल ही में संपन्न हुए 2024 के लोकसभा चुनाव में जहानाबाद की जनता ने सत्ता विरोधी लहर और स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए बदलाव का फैसला किया। राजद के वरिष्ठ और कद्दावर नेता सुरेंद्र प्रसाद यादव ने एक बार फिर शानदार वापसी करते हुए इस सीट पर जीत दर्ज की।
जहानाबाद लोकसभा क्षेत्र को समझने के लिए केवल राजनीतिक दलों के नाम काफी नहीं हैं, बल्कि इसके भीतर काम करने वाले सामाजिक और आर्थिक कारकों को समझना भी बेहद जरूरी है। जहानाबाद को पारंपरिक रूप से भूमिहार, यादव और विभिन्न सवर्ण , अत्यंत पिछड़ी जातियों (EBC) तथा दलित मतदाताओं की बहुलता वाला क्षेत्र माना जाता है। यहाँ की चुनावी जंग अक्सर यादव बनाम भूमिहार केंद्रित त्रिकोण के इर्द-गिर्द घूमती रही है। हालांकि, पिछले कुछ चुनावों में कुर्मी-कोइरी (लव-कुश) और महादलित व ईबीसी मतदाताओं की मूक लामबंदी ने चुनाव परिणामों को पलटने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। 2019 में चंदेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी की जीत और 2024 में सुरेंद्र प्रसाद यादव की वापसी इसी सामाजिक इंजीनियरिंग का नतीजा मानी जाती है।
जहानाबाद का मतदाता वैचारिक रूप से जितना जागरूक है, बुनियादी समस्याओं को लेकर उतना ही मुखर भी है। यहाँ के मुख्य मुद्दों में शामिल हैं: सिंचाई और कृषि संकट: मगध का यह इलाका कृषि प्रधान है, इसलिए नहरों का आधुनिकीकरण, सोन नहर प्रणाली से पानी की उपलब्धता और सुखाड़ से निपटना यहाँ का सबसे बड़ा मुद्दा रहता है।: स्थानीय स्तर पर बड़े उद्योगों की कमी के कारण युवाओं का बड़े पैमाने पर पलायन होता है, जो हर चुनाव में युवाओं के बीच चर्चा का मुख्य विषय बनता है। जहानाबाद में बेहतर उच्च शिक्षण संस्थानों और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की मांग दशकों पुरानी है।
जहानाबाद लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत कुल 6 विधानसभा सीटें आती हैं, जो तीन अलग-अलग जिलों (जहानाबाद, अरवल और गया) में फैली हुई हैं। यह विविधता ही इसके लोकसभा चुनाव को और अधिक व्यापक बनाती है: जहानाबाद (जहानाबाद जिला) , मखदुमपुर (जहानाबाद जिला - सुरक्षित) ,घोसी (जहानाबाद जिला) , अरवल (अरवल जिला) , कुर्था (अरवल जिला) , अतरी (गया जिला) इन सभी विधानसभा क्षेत्रों का अपना एक अलग मिजाज है। अरवल और कुर्था जहाँ कभी वामपंथी आंदोलनों के सबसे बड़े केंद्र हुआ करते थे, वहीं घोषी और अतरी राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और रसूखदारों की पारंपरिक सीटें मानी जाती रही हैं। इन छह क्षेत्रों से मिलने वाली बढ़त ही अंततः तय करती है कि दिल्ली की संसद में जहानाबाद की आवाज कौन बनेगा।
जहानाबाद लोकसभा क्षेत्र का 1957 से 2024 तक का सफरनामा इस बात का जीता-जागता सबूत है कि यहाँ की जनता राजनीतिक रूप से बेहद जागरूक और मुखर है। इस क्षेत्र ने कभी भी किसी एक दल के वर्चस्व को स्थायी नहीं होने दिया। जब कांग्रेस से मोहभंग हुआ तो वामपंथ को अपनाया, जब वामपंथ अप्रासंगिक होने लगा तो सामाजिक न्याय के पुरोधाओं को मौका दिया, और जब विकास और राष्ट्रवाद की बात आई तो नए चेहरों को आजमाने से भी गुरेज नहीं किया।2024 में सुरेंद्र प्रसाद यादव की जीत के साथ जहानाबाद के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है। अब देखना यह होगा कि आने वाले समय में यह क्षेत्र देश की मुख्यधारा के विकास के साथ कदम से कदम मिलाकर कैसे आगे बढ़ता है और यहाँ के जनप्रतिनिधि जनता की आकांक्षाओं पर कितने खरे उतरते हैं।
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