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भस्म संस्कृति: आदिदेव से आधुनिकता तक

भस्म संस्कृति: आदिदेव से आधुनिकता तक

सत्येन्द्र कुमार पाठक
शून्य से अनंत की यात्रा में भारतीय दर्शन में 'भस्म' केवल दहन का अवशेष नहीं, बल्कि सृष्टि के अंतिम सत्य का उद्घोष है। जब अग्नि किसी पदार्थ को आत्मसात करती है, तो जो शेष बचता है, वह निर्विकार और शाश्वत होता है। 'भस्म' इस बात का प्रतीक है कि नाम और रूप नश्वर हैं, किंतु तत्व अमर है। आदिदेव शिव के अंगों पर सुशोभित होने वाली यह भस्म आज वैश्विक स्तर पर अपनी वैज्ञानिकता और आध्यात्मिक गहराई के कारण पुनः विमर्श के केंद्र में ह
भस्म संस्कृति का मूल 'यज्ञ' में निहित है। वेदों के अनुसार, सृष्टि स्वयं एक महान यज्ञ है। ऋग्वेद में अग्नि को देवताओं का मुख कहा गया है। जब हम पवित्र जड़ी-बूटियों, समिधा और हविष्य को अग्नि को समर्पित करते हैं, तो जो सूक्ष्म रूप बचता है, वही 'विभूति' है।
संस्थापक और अधिष्ठाता भस्म संस्कृति के आदि-संस्थापक भगवान शिव हैं। उन्होंने श्मशान की राख को शरीर पर लगाकर यह सिद्ध किया कि जिसे संसार 'अमंगल' मानकर त्याग देता है, वह भी परमात्मा के लिए मंगलकारी है। भस्म हमें सिखाती है कि यह शरीर मिट्टी है और अंततः मिट्टी (राख) में ही मिलना है। यह मनुष्य के अहंकार को गलाकर उसे विनम्र बनाती है। समय की धारा के साथ भस्म के स्वरूप और नाम बदलते रहे हैं। सतयुग में भस्म को 'विभूति' कहा गया, जिसका अर्थ है 'ऐश्वर्य'। यह दैवीय शक्तियों के अर्जन का माध्यम थी। त्रेतायुग में ऋषि-मुनियों के यज्ञों का मुख्य प्रसाद 'भस्म' था। भगवान राम के वनवास काल में तपस्वियों के सान्निध्य में भस्म लेपन को वैराग्य का प्रतीक माना गया। द्वापरयुग (भभूत): योगेश्वर कृष्ण के काल में यह 'भभूत' के रूप में प्रसिद्ध हुई। विशेषकर योगियों और सिद्धों ने इसे आशीर्वाद के रूप में लोक-कल्याण हेतु प्रयोग किया। कलियुग (राख/उदी): वर्तमान काल में यह श्रद्धा का केंद्र है। शिरडी के साईं बाबा द्वारा दी गई 'उदी' या महाकाल की 'भस्म आरती' आज भी करोड़ों लोगों की आस्था का आधार है।
वैश्विक क्षितिज पर भस्म संस्कृति में भस्म का सम्मान केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक वैश्विक संस्कृति रही है: मिस्र (Egypt): प्राचीन मिस्रवासी भस्म को पुनर्जन्म का प्रतीक मानते थे। 'फीनिक्स' पक्षी की राख से जीवित होने की कथा इसी दर्शन का हिस्सा है। मेसोपोटामिया और ग्रीस: प्राचीन यूनानी दार्शनिकों ने 'अग्नि' को मूल तत्व माना और राख को पदार्थ का शुद्धतम रूप। थाईलैंड और श्रीलंका: दक्षिण-पूर्व एशिया के मंदिरों में आज भी 'विभूति' का तिलक किया जाता है, जो भारतीय सांस्कृतिक विस्तार का प्रमाण है। अमेरिका और यूरोप: आज की 'ऐश वेडनेसडे' परंपरा या आधुनिक चिकित्सा में 'एक्टिवेटेड चारकोल' का प्रयोग इसी प्राचीन ज्ञान का आधुनिक रूपांतरण है। भस्म किसी एक पंथ की जागीर नहीं रही, बल्कि इसने सभी धर्मों को जोड़ा है। शैव और शाक्त: शिव और शक्ति के उपासकों के लिए भस्म ही श्रृंगार है। वैष्णव और सौर: यज्ञीय भस्म का तिलक सूर्य के तेज और विष्णु की व्यापकता को दर्शाने के लिए किया जाता है। बौद्ध और जैन: वज्रयान बौद्ध धर्म में तांत्रिक अनुष्ठानों में भस्म का प्रयोग होता है। जैन धर्म में भी कई प्राचीन पंथों में भस्म को शुद्धि का कारक माना गया। सिख संप्रदाय: बाबा श्रीचंद के उदासी संप्रदाय और निर्मले पंथ में धूनी और भस्म का बड़ा महत्त्व है। अब्राहमिक धर्म (ईसाई, यहूदी, इस्लाम): ईसाई धर्म में 'ऐश वेडनेसडे' और यहूदी परंपराओं में पश्चाताप के लिए राख का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि भस्म वैश्विक मानवीय चेतना का अंग है। पारसी धर्म: अग्नि पूजक पारसियों के लिए पवित्र अग्नि की राख अत्यंत पावन है।
मगध का इतिहास भस्म संस्कृति के बिना अधूरा है। बिहार और झारखंड के क्षेत्रों में इसके जीवंत प्रमाण मिलते हैं:
बराबर और नागार्जुन की गुफाएं (जहानाबाद): मौर्यकालीन ये गुफाएं केवल स्थापत्य का नमूना नहीं हैं, बल्कि ये पाशुपत और नाथपंथी साधुओं की तपस्थली रही हैं। इन गुफाओं की शांति और वहां की धूनी के अवशेष प्राचीन साधना पद्धति को प्रमाणित करते हैं। गया और फल्गु: पितृ तीर्थ गया में भस्म का लेपन जीवन और मृत्यु के मिलन का प्रतीक है। वैशाली वो सारण का सोनपुर में कोनारा घाट की भस्म होली है। नाथ संप्रदाय: बिहार के ग्रामीण अंचलों में 'गुरु गोरखनाथ' की परंपरा में भभूत को आज भी औषधि और आशीर्वाद माना जाता है।
आधुनिक विज्ञान भी भस्म के चमत्कारों को स्वीकार कर रहा है: तापमान नियंत्रण: नागा साधु निर्वस्त्र रहकर भी बर्फानी ठंड में जीवित रहते हैं क्योंकि भस्म शरीर के रोम-छिद्रों को बंद कर देती है, जिससे शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकलती।कीटाणुनाशक गुण: भस्म एक प्राकृतिक 'एंटी-सेप्टिक' है। यह मच्छर, खटमल और त्वचा के संक्रमण से रक्षा करती है। नैनो-मेडिसिन: आयुर्वेद की भस्म प्रक्रिया (जैसे स्वर्ण या अभ्रक भस्म) धातुओं को सूक्ष्म कणों में बदल देती है, जो सीधे कोशिकाओं में जाकर रोगों को जड़ से मिटाते हैं। मनोवैज्ञानिक प्रभाव: माथे पर भस्म लगाने से 'आज्ञा चक्र' प्रभावित होता है, जिससे मानसिक एकाग्रता बढ़ती है और तनाव कम होता है।
भस्म के प्रकार और निर्माण की कला की शास्त्रों ने भस्म को उसकी शुद्धि के आधार पर बांटा है:श्रौत भस्म: वेदोक्त यज्ञों से प्राप्त। स्मार्त भस्म: स्मृतियों के विधान से निर्मित। लौकिक भस्म: गो-काष्ठ (कण्डे) या विशेष लकड़ियों से निर्मित। विशेष औषधि भस्म: स्वर्ण, रजत, मुक्ताशुक्ति और शंख भस्म जैसे रसायन आज भी कैंसर, दमा और हृदय रोगों में जीवनदायिनी सिद्ध हो रहे हैं।
भस्म संस्कृति हमें 'समरसता' सिखाती है। श्मशान की भस्म जब शरीर पर लगती है, तो जाति, पद और धन का अहंकार भस्म हो जाता है। यह शिक्षा देती है कि हम सभी अंततः एक ही तत्व से बने हैं। शैक्षणिक दृष्टि से, यह प्राचीन रसायन शास्त्र की उत्कृष्टता का प्रतीक है।
आज जब दुनिया प्रदूषण और मानसिक अवसाद से जूझ रही है, भस्म की शुद्धि और उसकी सादगी एक नया मार्ग दिखाती है। यह केवल राख नहीं, यह हमारी जड़ों की शक्ति है। 'मगध ज्योति' के माध्यम से इस प्राचीन गौरव को पुनर्जीवित करना समय की मांग है। "चढ़ी भभूत घट हुआ निर्मल" - आइए, हम अपनी इस 'भस्म संस्कृति' को सहेजें, क्योंकि इसमें केवल धर्म नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता का कल्याण और विज्ञान छिपा है।
भारतीय वाङ्मय में 'भस्म' केवल दहन का अवशेष नहीं, बल्कि रूपांतरण की पराकाष्ठा है। यह पदार्थ की वह अंतिम अवस्था है, जहाँ पहुँचकर रूप, रंग और गुण का भेद समाप्त हो जाता है। अग्नि जब किसी तत्व को आत्मसात करती है, तो जो शेष बचता है, वह निर्विकार, शुद्ध और शाश्वत होता है। 'भस्म' इस सत्य का उद्घोष है कि सृष्टि नश्वर है और अंततः सब कुछ इसी सूक्ष्म रूप में विलीन होना है। आदिदेव शिव के अंगों पर सुशोभित होने वाली यह भस्म आज वैश्विक स्तर पर अपनी दार्शनिक गहराई, वैज्ञानिक प्रासंगिकता और सांस्कृतिक व्यापकता के कारण शोध का विषय है।
भस्म संस्कृति केवल भारत की सीमाओं में सीमित नहीं रही, बल्कि इसने महाद्वीपों की यात्रा की है:मगध की धरती (बिहार व झारखंड): मगध प्राचीन काल से ही तंत्र और योग का केंद्र रहा है। गया , जहानाबाद की बराबर और नागार्जुन गुफाएं आजीवक और पाशुपत साधुओं की साधना स्थली रही हैं, जहाँ धूनी की राख आज भी इतिहास की गवाह है। देवघर (बैद्यनाथ धाम) में भस्म का लेपन शिव-शक्ति के मिलन का प्रतीक है। काशी और उज्जैन: काशी 'महामशान' है, जहाँ मणिकर्णिका की राख को शरीर पर मलना मोक्ष का मार्ग माना जाता है। वहीं उज्जैन में महाकाल की भस्म आरती काल के ऊपर विजय का प्रतीक है। दक्षिण भारत: यहाँ इसे 'विभूति' कहा जाता है। चावल की भूसी और गऊ के गोबर से निर्मित यह शुभ्र भस्म माथे पर तीन रेखाओं (त्रिपुण्ड्र) के रूप में लगाई जाती है, जो ज्ञान, इच्छा और क्रिया का प्रतीक है। वैश्विक संदर्भ (मिस्र, थाईलैंड, श्रीलंका): प्राचीन मिस्र में राख को पुनर्जन्म का कारक माना जाता था। थाईलैंड और श्रीलंका के बौद्ध व हिंदू मंदिरों में 'विभूति' वितरण की परंपरा आज भी जीवंत है।
अब्राहमिक धर्म: ईसाई धर्म में 'ऐश वेडनेसडे' के दिन माथे पर राख लगाना इस सत्य को स्वीकार करना है कि— "तू मिट्टी है और मिट्टी में ही मिल जाएगा।" यह पश्चाताप और शुद्धि का वैश्विक प्रतीक है भस्म ने कभी संप्रदायों के बीच दीवार खड़ी नहीं की, बल्कि उन्हें जोड़ा: शैव, शाक्त और सौर: शिव के लिए यह वस्त्र है, शक्ति के लिए यह ऊर्जा का पुंज है और सौर उपासकों के लिए यह सूर्य के तेज का अवशेष। नाथ और सिद्ध संप्रदाय: गुरु गोरखनाथ ने भभूत को सिद्धियों का आधार बनाया। "उलटन्त बिभूत पलटन्त काया" जैसे सूत्र इसी परंपरा की देन हैं। सिख और अन्य पंथ: उदासी और निर्मले संप्रदाय में धूनी का बड़ा महत्व है। पारसी धर्म में 'अताश बेहराम' (पवित्र अग्नि) की राख को पावन मानकर माथे पर लगाया जाता है।
संदर्भ ग्रंथ सूची: शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता) , हठयोग प्रदीपिका (नाथ परंपरा) , आयुर्वेद सार संग्रह (भस्म प्रकरण) , क्षेत्रीय सर्वेक्षण रिपोर्ट: मगध की पुरातात्विक धरोहर (बराबर गुफाएं) , गया , सोनपुर विश्व धर्म इतिहास (अब्राहमिक और पूर्वी संस्कृतियों का तुलनात्मक अध्ययन)
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