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कर्म , कृत्य , काम

कर्म , कृत्य , काम

अरुण दिव्यांश

कर्म कर तू कर्म कर ,
कर्म में ही धर्म कर ।
न रो पछता भाग्य पे ,
कर्म में न शर्म कर ।।
संस्कार से जो प्रीती है ,
कर्म ही तेरा कृति है ।
मानव जन्म लिए हो ,
कर्तव्यपालन वृत्ति है ।।
जीवन एक निबंध है ,
जन्म से ही अनुबंध है ।
चलते रह तू कर्मपथ पे ,
कर्म ये सुंदर सुगंध है ।।
कर्म से विचलित होना ,
नयन रहते यह अंध है ।
समझा बूझा अंधा होना ,
जीवन हेतु ही दुर्गंध है ।।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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