जल संरक्षण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता: सत्येंद्र कुमार पाठक
जहानाबाद । विश्व जल दिवस के शुभ अवसर पर जीवन धारा नमामि गंगे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, प्रख्यात साहित्यकार एवं इतिहासकार श्री सत्येंद्र कुमार पाठक ने वैश्विक जल संकट पर चिंता व्यक्त करते हुए जनमानस से जल संरक्षण का आह्वान किया है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति जल से हुई है और जल के बिना भविष्य की कल्पना करना असंभव है। श्री पाठक ने बताया कि विश्व जल दिवस मनाने की परिकल्पना 22 मार्च 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में आयोजित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (पर्यावरण एवं विकास) के दौरान की गई थी। इसके पश्चात, 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसे एक वार्षिक आयोजन के रूप में स्वीकार किया। इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया के सभी देशों में स्वच्छ एवं सुरक्षित जल की उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा जल संरक्षण के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। संयुक्त राष्ट्र ने अपने 'एजेंडा 21' में भी इसका विस्तृत खाका प्रस्तुत किया था। वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालते हुए इतिहासकार सत्येंद्र कुमार पाठक ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े डराने वाले हैं। विश्व की लगभग 4 बिलियन आबादी वर्ष में कम से कम एक महीना भारी जल संकट का सामना करती है। वहीं, दुनिया की करीब एक चौथाई आबादी (1.6 बिलियन लोग) को आज भी स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं है। यह एक कड़वा सच है कि पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का 99% हिस्सा महासागरों और खारे स्रोतों में है, जबकि पीने योग्य मीठा पानी मात्र 1% या उससे भी अधिक है । श्री पाठक ने चिंता जताते हुए कहा कि बढ़ती आबादी और अनियंत्रित औद्योगिकीकरण के कारण शहरों में पानी की मांग और खपत तेजी से बढ़ी है। मनुष्य अपने जीवनकाल में अथाह जल का उपयोग तो करता है, परंतु उसके संरक्षण की दिशा में किए जाने वाले प्रयास नगण्य हैं। अत्यधिक दोहन के कारण भूजल स्तर (वॉटर टेबल) काफी नीचे चला गया है, जिसके परिणामस्वरूप पानी में लवण की मात्रा बढ़ रही है, जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। इतिहास के झरोखे से देखते हुए उन्होंने उल्लेख किया कि विश्व की अधिकांश महान संस्कृतियां नदियों के किनारों पर ही विकसित हुई हैं। चाहे वह गंगा की गोद में पली सभ्यता हो या विश्व की अन्य नदियां, जल हमेशा से मानव विकास का केंद्र रहा है। आज वैज्ञानिक भी अन्य ग्रहों पर जीवन की संभावना तलाशने के लिए सबसे पहले जल की ही खोज करते हैं।'जीवन धारा नमामि गंगे' के माध्यम से जल एवं पर्यावरण के प्रति समर्पित श्री पाठक ने संदेश दिया कि इस वर्ष की थीम "जल और दीर्घकालिक विकास" तभी सार्थक होगी जब हर नागरिक जल की एक-एक बूंद बचाने का संकल्प लेगा। उन्होंने अपील की है कि जल का अनावश्यक उपयोग बंद किया जाए और जलाशयों के संरक्षण हेतु सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित की है।
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