भाषाई विविधता के संरक्षण है कविता दिवस सत्येंद्र कुमार पाठक
जहानाबाद। विश्व कविता दिवस के अवसर पर साहित्यकार एवं इतिहासकार सत्येंद्र कुमार पाठक ने वैश्विक समुदाय और स्थानीय साहित्य प्रेमियों के नाम एक विशेष आलेख साझा किया है। इस आलेख के माध्यम से उन्होंने कविता के ऐतिहासिक सफर, इसकी प्रासंगिकता और भाषाई विविधता के संरक्षण में इसके योगदान पर प्रकाश डाला है। श्री पाठक ने बताया कि 21 मार्च को विश्व कविता दिवस मनाने की आधिकारिक घोषणा यूनेस्को (UNESCO) द्वारा वर्ष 1999 में पेरिस सम्मेलन के दौरान की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य "काव्य अभिव्यक्ति के माध्यम से भाषाई विविधता का समर्थन करना और लुप्तप्राय भाषाओं को सुनने के अवसर प्रदान करना" था। उन्होंने रेखांकित किया कि यूनेस्को के इस कदम ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कविता आंदोलनों को एक नई पहचान और प्रोत्साहन दिया है।ऐतिहासिक तथ्यों को साझा करते हुए सत्येंद्र कुमार पाठक ने बताया कि 20वीं शताब्दी में यह दिवस अक्सर 15 अक्टूबर को मनाया जाता था, जो प्रसिद्ध रोमन महाकाव्य कवि और सम्राट ऑगस्टस के राजकवि वर्जिल का जन्मदिन था। 15 अक्टूबर 1951 को दुनिया के 41 देशों ने मिलकर इस दिवस को मनाया था, जिसका प्रमाण 'द इंटरनेशनल हूज़ हू इन पोएट्री 1978-79' जैसे ऐतिहासिक संदर्भों में मिलता है। आज भी यूनाइटेड किंगडम सहित कई देशों में अक्टूबर या नवंबर में कविता दिवस मनाने की परंपरा जीवित है। श्री पाठक ने अपने आलेख में पेन इंटरनेशनल (PEN International) की भूमिका की सराहना की। उन्होंने बताया कि 1997 में एडिनबर्ग कांग्रेस के दौरान तारिक गुनेर्सल (पेन तुर्की) की प्रस्तुति और मेलबर्न पेन के समर्थन के बाद ही इसे यूनेस्को के आधिकारिक कैलेंडर में स्थान मिला। इसकी नींव 1996 में 'पोएटिक स्पेस लैब' के माध्यम से रखी गई थी। इतिहासकार पाठक ने वर्ष 2021 के ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए बताया कि यूनेस्को ने उस वर्ष को महान मैसेडोनियन कवि, अनुवादक और भाषाविद् ब्लाज़े कोनेस्की की 100वीं वर्षगांठ को समर्पित किया था। साथ ही, उन्होंने ब्रिटिश कवयित्री कैरोल एन डफी को 'गोल्डन व्रीथ पुरस्कार' मिलने की घटना को कविता के वैश्विक प्रभाव का प्रतीक बताया। श्री पाठक ने कहा, "कविता केवल शब्दों का चयन नहीं, बल्कि समाज का वह आईना है जो लुप्त होती संस्कृति और भाषाओं को संजीवनी प्रदान करता है। आज के डिजिटल युग में कविता के पठन, लेखन और शिक्षण को जमीनी स्तर पर बढ़ावा देना अनिवार्य है।" उन्होंने आह्वान किया कि नई पीढ़ी को कविता के माध्यम से अपनी जड़ों और मातृभाषा से जुड़ना चाहिए।
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