नगर के डगर में
अरुण दिव्यांशनगर के डगर में ,
जहाॅं जहाॅं ठाॅंव बा ।
एने ओने घूम देखीं ,
उहें बसत गाॅंव बा ।।
गाॅंव के बाहर गाछी ,
गाछी चिड़ईं के बास ।
गाछी से नगर विहीन ,
नगर उजाड़ उदास ।।
नगर गाॅंव घूम देखीं ,
नगर बसत दाॅंव बा ।
नगर में हाथ महत्ता ,
गाॅंव के सुनर पाॅंव बा ।।
गाॅंव हो कहीं न गर ,
नगर कहाॅं आ बसे ।
गाॅंव बिन नगर अधूरा ,
जईसे करिया नाग डॅंसे ।।
गाॅंव जईसे पिक बोले ,
नगर में कउआ काॅंव बा ।
घर के बाहर मिले घाम ,
गाॅंव में बगिया छाॅंव बा ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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