कल्पनाओं का जाल
कल्पनाओं का जाल तू ,विचारों का है ताल तू ,
धीमी तीव्र का चाल तू ,
है चाल तू भूचाल तू ।
जीवन का जंजाल तू ,
मालामाल फटेहाल तू ,
कर्म तेरे बड़े ही अनोखे ,
निहाल तू बदहाल तू ।
है पाल तू प्रतिपाल तू ,
है मिसाल तू मशाल तू ,
है काल तू अकाल तू ,
जीवन बूटि कमाल तू ।
है ढाल तू बेढाल तू ,
भली बुरी खयाल तू ,
स्वयं गाल तू गुलाल तू ,
पक्षियों का है डाल तू ।
स्वयं ताल तू थाल तू ,
गलने न देती दाल तू ,
बुजुर्ग और है बाल तू ,
मलाल तू विकराल तू ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण ) बिहार ।
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