लोभ की जंजीरें
अरुण दिव्यांशलोभ की जंजीरें तोड़कर ,
बेवफाई से मुख मोड़कर ,
नेकी से निज को जोड़कर ,
बढ़ता चल तू बढ़ता चल ।
न किसी से ही तू दूर जा ,
नहीं पथ तू बहुत क्रूर जा ,
हर दिल के बन तू नूर जा ,
धीमे धीमे शीर्ष चढ़ता चल ।
कर शीघ्र लोभ से इन्कार ,
न बन तू लोभ का शिकार ,
कर सच्चे जीवन से प्यार ,
जंजीरें तोड़ने कढ़ता चल ।
यह सुन तो तू मेरे मीत ले ,
लोभ ईर्ष्या को तू जीत ले ,
जीवन से यह नवप्रीत ले ,
गीत प्रीत के तू पढ़ता चल ।
तुम लोभ की जंजीर को ,
तुम तोड़ दो इसे अधीर हो ,
भारत के तुम तकदीर हो ,
व्यवहार मधुरता गढ़ता चल ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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