मन को बस वहीं रोक दो
अरुण दिव्यांशमत बढ़ने दो मन को आगे ,
मन को बस वहीं रोक दो ।
रोक न सके मन को यदि तो ,
अग्नि में मन को झोंक दो ।।
मत होने दो इसे अनियंत्रित ,
सदा रखो इसे नियंत्रण में ।
हुआ मन गर ये अनियंत्रित ,
मौत बुलाएगा निमंत्रण में ।।
मन को बस वहीं पे रोक दो ,
नहीं समझे तो उसे टोक दो ।
जैसे हो उसे करो नियंत्रित ,
न समझे उसे तो शोक दो ।।
उर यह गंभीर होता जितना ,
मन को भी गंभीर बनाओ ।
फिर भी मचलता मन यदि ,
समझा समझा धीर बॅंधाओ ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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