सृजन की हरीतिमा,स्त्रियों के रक्त में
कुमार महेंद्रमाधुर्य वात्सल्य नेह सागर,
पोषण निर्माण अद्भुत शक्ति ।
सूक्ष्म जीवन निर्वाह कला,
जन्म रूपांतर पवित्र युक्ति ।
अहम कड़ी मानवता उत्थान,
प्रणय परिभाषा विरक्त में ।
सृजन की हरीतिमा,स्त्रियों के रक्त में ।।
जीव परिष्कार परम उपमा,
त्वरित अनुभूत मन भाषा ।
संघर्ष अंतर सहिष्णु छवि,
पर खुशियां निज अभिलाषा ।
जीवन हर पल मंगल भोर,
हृदय बिंदु धर्म आस्था सिक्त में ।
सृजन की हरीतिमा,स्त्रियों के रक्त में ।।
संस्कार परंपरा मर्यादा सेतु,
हर क्षेत्र मंच नव कीर्तिमान ।
शिक्षा विज्ञान प्रगति शोभा,
अग्र कदम नवाचारी आह्वान ।
बुलंद स्वर अधिकार अभिरक्षा,
आत्मविश्वास विचार अभिव्यक्त में ।
सृजन की हरीतिमा,स्त्रियों के रक्त में ।।
विमल मृदुल अंतःकरण,
अंग प्रत्यंग बसंत बहार ।
मुखमंडल मुस्कान लावण्य,
मिलनसारी मधुर व्यवहार ।
विनम्रता सामंजस्यता अनन्य,
द्विकुल रक्षा स्वाभिमान सशक्त में।
सृजन की हरीतिमा,स्त्रियों के रक्त में ।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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