होली का रस रंग
जय प्रकाश कुवंरलाल गुलाबी नीला पीला,
इंद्रधनुषी सतरंगी रंग।
चेहरा ऐसा पुता हुआ है,
दिखता नहीं है कोई अंग।।
बच्चा बुढ़ा भेद नहीं है,
सभी बने हैं सतरंगी।
रंग अबीर झोली में लेके,
सभी दिखते हैं हुड़दंगी।।
गाढ़ा रंग मलकर मुख पर,
नारी पुरुष सब ढो रहे हैं।
चेहरा बना है ऐसा की,
पहचान अपना खो रहे हैं।।
सभी तरफ है अल्हड़ मस्ती,
और साथ में हास्य उमंग।
यौवन टोली पर बरबस,
बरस रहा है सुखा गीला रंग।।
ढोल मजीरा बजने से है,
जीवन बना गुलजार।
फगुआ गाने वालों की टोली,
जगह जगह है तैयार।।
होली के इस रस रंग को,
कोई बुरा न मानो भाई।
खुशी खुशी इस साल गयी तो,
होली अगले साल फिर आई।।
होली ऐसा पर्व हमारा,
रूठे दिल भी मिल जाते हैं।
अपना पराया भेद न रहता,
सबके चेहरे खिल जाते हैं।।
सभी दोस्तों और देशवासियों को
होली की शुभकामनाएं🙏
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