होली का वो अल्हड़पन
:दिलीप कुमार पाठकमहादेव थान में गूँजती, वो झाल-ढोल की तान,
हारमोनियम संग जागते, बच्चों के अरमान।
रात भर जो गायन चलता, सुबह कीच का खेल।
मुसकइल मिट्टी, नाली का पानी, और अपनों का मेल।।
पाहुन को भी छोड़ते न थे, नाली में देते लोट।
पर हँसी-ठिठोली ऐसी थी, लगती न थी चोट।।
अग्जा वाली राख देह पर, साबुन सा अहसास।
खार में फिर जो छलांग थी, वो मस्ती थी खास।।
पोटीन के वो जिद्दी रंग, और पुआ-पुड़ी का स्वाद।
छिप-छिपाकर जो भांग चखी, वो आती है याद।।
नींबू के अचार का डर, और माँ की वो फटकार।
दहीबड़ों की खुशबू से, महकता था घर-द्वार।।
मुँहलुकान की चहल-पहल, गोतियों का आना।
'अहो लाला' का 'हो रामा' में, चइता बन मिल जाना।।
वो फगुआ का गोल पाठक जी, अब ढूँढे न मिलता।
पर आपकी यादों के फागुन में, वो आज भी है खिलता।।
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