बाल गाल
बाल गाल लाल गुलाल है ,तिलक सुशोभित कपाल है ,
उछलता मचलता उर यह ,
मनमोहक वृत्ति रखे पाल है ।
तन सुशोभित नव वस्त्र से ,
मन सुशोभित प्रेम अस्त्र से ,
अजर अमर प्रेम सुशोभित ,
कट नहीं सके प्रेम शस्त्र से ।
बाल मन अति पावन हुआ ,
बाल प्रेम अति सावन हुआ ,
श्रेष्ठ जन मन हो गए हर्षित ,
बाल हृदय मनभावन हुआ ।
बाल मन हैं भविष्य हमारे ,
कल को राष्ट्र हैं यही सॅंवारे ,
बाल मन जन जन है हर्षाए ,
बाल मन तो ईश को प्यारे ।
बाल होनहार हैं कृति हमारे ,
बाल संस्कार प्रीति हमारे ,
संग त्यौहार मनाना सजाना ,
होली दिवाली बाल पुकारे ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
डुमरी अड्डा
छपरा ( सारण )बिहार ।
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