"वसंत का रहस्य : रंगों के संग"
पंकज शर्माअरुणाभ नभ के नील वितान पर
किसने बिखेरा अबीर-अभास?
किस अदृश्य कर ने रँग डाला
जीवन का यह मौन प्रकाश?
धरा ने हरित वसन धारण कर
गुलाल-सी अरुणिमा ओढ़ी है;
यह केवल उत्सव का रंग नहीं—
चेतना ने नव दीक्षा जोड़ी है।
मृदु समीर में उड़ती रजकण
मानो युग-संचित स्मृति के रंग;
भीतर सोई वेदना जागी,
हँसकर भरने लगी उमंग।
भ्रमर-गुंजार में ढोलक-सा
काल का गुप्त स्पंदन है;
पतझर की राखों से उठता
जीवन का पुनरावर्तन है।
यह होली केवल बाह्य क्रीड़ा
नहीं हर्ष का क्षणिक प्रसंग;
यह तो अंतर की अग्नि से
धुलता संशय, मिटता दंग।
विरह-व्योम पर उड़ी पिचकारी—
मिलन-प्रभा का प्रथम रंग;
आत्मा ने आत्मा को छूकर
तोड़ दिया सीमाओं का जंग।
आओ, अंत: के कपाट खोलो,
मन को होने दो निष्कंग;
इस रंग-रेखा में ब्रह्म-छाया—
जीवन के रंग, होली के संग।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️
(शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
04 मार्च सन् 2026
फाल्गुन के पावन रंगोत्सव पर हमारी मंगलकामना है कि होली के ये शुभ वर्ण आपके जीवन में धैर्य, करुणा, त्याग एवं सत्य का उज्ज्वल प्रकाश भर दें। ईश्वर से प्रार्थना है कि आपका अंतर्मन निर्मल हो, विचार नव-पल्लवित हों, एवं जीवन का प्रत्येक क्षण चिरस्थायी रसात्मक आनंद से आलोकित रहे।
इन्हीं भावों सहित आप सभी को होली-पर्व की सादर, सप्रेम शुभकामनाएँ।
पंकज शर्मा (कमळ सनातनी)
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