वैदिक सृष्टि संवत अर्थात हिंदू नव वर्ष की वैज्ञानिकता
डॉ राकेश कुमार आर्य
संसार के जितने भर भी कैलेंडर हैं वे सभी वैदिक सृष्टि संवत के सामने बहुत बौने हैं। वैदिक सृष्टि संवत ही संसार का प्रमाणिक वैज्ञानिक और एकमात्र सबसे प्राचीन अर्थात सबसे पहले सृष्टि संवत है। हमारे वैदिक विद्वानों की मान्यता के अनुसार वैदिक सृष्टि संवत 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हजार 127 वर्ष पुराना है। इस सृष्टि संवत की नकल करते हुए अन्य कैलेंडर प्रचलन में आए हैं। भारत के महान शासक विक्रमादित्य ने अपने 250 वर्ष के जीवन काल में लगभग 183 वर्ष तक शासन किया था उनका साम्राज्य में आज का रोम भी सम्मिलित था। उनकी महानता उनवान करते हुए भारत में विक्रम संवत का भी प्रचलन हुआ। यह विक्रम संवत ईसा मसीह से 57 वर्ष पहले से प्रचलन में था। इसी की नकल करते हुए ईसवीं सन आरंभ हुआ।
हम सभी जानते हैं कि वैदिक संस्कृति पूर्णतया वैज्ञानिकता पर आधारित संस्कृति है । इसके प्रत्येक रीति – रिवाज, तीज- त्यौहार आदि के पीछे भी कोई न कोई वैज्ञानिक कारण होता है। परंपरा और रूढ़ि की विद्रूपता ने आज चाहे इन परंपराओं, रीति-रिवाजों व तीज त्यौहारों को कितना ही विद्रूपित क्यों न कर दिया हो, परंतु ध्यान से देखने पर इनके पीछे हमारे ऋषियों का बौद्धिक और वैज्ञानिक चिंतन स्पष्ट दिखाई देता है। यदि बात वैदिक संस्कृति में मन्वंतर और संवत्सर की करें तो इसके पीछे भी हमारे ऋषि पूर्वजों का उत्कृष्ट ज्ञान और उनका बौद्धिक विवेक दिखाई देता है । 4 अरब 32 करोड़ की सृष्टि की अवस्था को हमारे ऋषियों ने 14 मन्वंतरों में विभाजित किया है। प्रत्येक मन्वंतर का एक मनु होता है। एक मनु से दूसरे मनु के बीच के अंतर को ही मन्वंतर कहते हैं। चौदह मनु और उनके मन्वन्तरों की अवधि को मिलाकर एक कल्प का निर्माण है। एक कल्प में 4 अरब 32 करोड़ की सृष्टि और 4 अरब 32 करोड़ की प्रलय होती है। दोनों को मिलाकर 8 अरब 64 करोड की कुल अवधि होती है। इसे ही ब्रह्मा का 1 दिन कहा जाता है।
वर्तमान काल 7 वां मन्वन्तर अर्थात् वैवस्वत मनु चल रहा है। इससे पूर्व 6 मन्वन्तर व्यतीत हो चुके हैं। जिनके नाम स्वायम्भुव, स्वारोचिष, औत्तमि, तामस, रैवत, चाक्षुष रहे हैं। एक मन्वंतर की अवधि 30 करोड़ 67 लाख 20 हजार वर्ष होती है। हमारे ऋषियों ने मन्वंतर आदि का गणित बहुत ही प्रामाणिकता के साथ बताया है ।
कुल 1000 चतुर्युगी पूरे सृष्टि काल में ( अर्थात 4 अरब 32 करोड़ों वर्ष) होती हैं। एक चतुर्युगी का काल 4320000 वर्ष है। हमारे विद्वानों की मान्यता के अनुसार इसका विवरण इस प्रकार है :-
1 मन्वन्तर = 71 चतुर्युगी
1 चतुर्युगी = चार युग अर्थात सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग।
चारों युगों का अलग-अलग काल :– सतयुग = 1728000 वर्ष, त्रेतायुग = 1296000 वर्ष ,द्वापरयुग = 864000 वर्ष और कलियुग = 432000 वर्ष।
इस प्रकार 1 चतुर्युगी का कुल काल या अवधि =1728000+1296000+864000+432000 = 4320000 वर्ष।
1 मन्वन्तर = 71 × 4320000(एक चतुर्युगी) = 306720000 वर्ष है।
अब तक इतनी अवधि के 6 मन्वन्तर बीत चुके हैं । इसलिए 6 मन्वन्तर की कुल आयु = 6 × 306720000 = 1840320000 वर्ष हुई। वर्तमान में 7 वें मन्वन्तर की यह 28 वीं चतुर्युगी है। इस 28 वीं चतुर्युगी में 3 युग अर्थात् सतयुग , त्रेतायुग, द्वापर युग की कुल अवधि बीत चुकी है और कलियुग का 5127 वां वर्ष चल रहा है । 27 चतुर्युगी की कुल आयु = 27 × 4320000(एक चतुर्युगी) = 116640000 वर्ष होती है। जबकि 28 वीं चतुर्युगी के सतयुग , द्वापर , त्रेतायुग और कलियुग की 5127 वर्ष की कुल अवधि = 1728000+1296000+864000+5127 = 3893127 वर्ष। इस प्रकार वर्तमान में 28 वीं चतुर्युगी के कलियुग की 5127 वें वर्ष तक की कुल आयु = 27 वीं चतुर्युगी की कुल आयु + 3893115 = 116640000+3893115 = 120533127 वर्ष हुई। इस प्रकार सृष्टि के अब तक के कुल बीते हुए वर्ष हैं = 6 मन्वन्तर की कुल आयु + 7 वें मन्वन्तर की 28 वीं चतुर्युगी के कलियुग तक की अर्थात 5127 वें वर्ष तक की कुल आयु = 1840320000+120533127 = 1960853127 वर्ष हुए। यही हमारा वैदिक सृष्टि संवत है ।
प्रत्येक वर्ष जब संवत परिवर्तित होता है तो इसी को वैदिक संवत्सर कहते हैं। 2026 ई0 में सृष्टि और उसके साथ सूर्य को बने 1,96,08,53,126 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। सृष्टि की कुल आयु 4320000000 वर्ष मानी जाती है। सृष्टि की कुल आयु में से एक अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हजार 1 सौ 26 वर्ष कम करने पर इस सृष्टि की शेष आयु निकल आएगी। जो कि अब 2,35,91,46,874 वर्ष शेष बचती है। तदुपरांत महाप्रलय निश्चित है। नासा के वैज्ञानिकों का भी यही मानना है कि अब इस सूर्य की शेष आयु 2 अरब 30 करोड़ से लेकर 2 अरब 50 करोड़ तक रह रही है।
पश्चिम के अनेक मूर्ख विद्वानों ने धरती पर मानव जीवन की कल्पना पिछले 5000 वर्ष में की है। उनमें से कुछ इस पिछले 10000 वर्ष में बनता बिगड़ता दिखाते हैं। वास्तव में यह उनकी कपोल कल्पना ही है। इसके साथ ही भारत के ऋषि वैज्ञानिकों की प्रमाणिकता को विनष्ट करने की उनकी षड्यंत्र भरी सोच का एक पहलू भी है। संसार का सबसे प्राचीन सृष्टि संवत हमारे पास होने के उपरांत भी हम पश्चिम की अवैज्ञानिक और मूर्खतापूर्ण सोच का पीछा कर रहे हैं, यह देखकर सचमुच दुख होता है। समय आ गया है जब हमें अपने वैज्ञानिक ऋषियों के चिंतन और उनकी अन्वेषणात्मक बुद्धि का सम्मान करते हुए अपने सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति समर्पित होना चाहिए।
एक प्रश्न यहां पर यह भी हो सकता है कि वैदिक सृष्टि संवत चैत्र माह में ही क्यों आता है ? इस पर एक प्राकृतिक सिद्धांत को समझा जा सकता है कि पहले जब गर्मी आती है तो गर्मी के पश्चात उमस और बारिश अपने आप हो जाती है। उसके पश्चात ठंड आ जाती है। कभी-कभी यह तीनों चीजें एक दिन में ही घटित होती हुई भी दिखाई देती हैं। इससे पता चलता है कि पहले गर्मी का मौसम अथवा ऋतु ही आनी चाहिए। उसके पश्चात वर्षा और वर्षा के पश्चात ठंड का मौसम आना चाहिए।
अपनी प्रामाणिक और वैज्ञानिक परंपराओं को छोड़कर हम लोग पश्चिम की नकल करते हुए जिस अंधेरी सुरंग में फंसे हुए खड़े हैं,उसने हमारी चाल - ढाल को परिवर्तित कर दिया है। हीरा होकर भी हम अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर लोहे के पीछे भाग रहे हैं। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि भारतवर्ष में वैदिक सृष्टि संवत या विक्रम संवत को यह स्थान प्राप्त भी हुआ। 22 मार्च 1957 को सरकारी स्तर पर शक संवत को यह स्थान प्रदान किया गया।
( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
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